झारखण्ड

RIMS Ranchi: क्या सरकारी तंत्र की मिलीभगत से लूटी गई रिम्स की जमीन, हाईकोर्ट के फैसले से भ्रष्टाचार पर हुआ कड़ा प्रहार…

RIMS Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) की जमीन पर हुए अवैध कब्जों को लेकर हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अस्पताल के विस्तार के लिए आरक्षित भूमि पर निजी इमारतों का खड़ा होना केवल एक अतिक्रमण नहीं, बल्कि (Systemic Institutional Corruption) का जीता-जागता प्रमाण है। दशकों से चल रहे इस खेल में शामिल सफेदपोश अधिकारियों और भू-माफियाओं के गठजोड़ को अब कानून के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

RIMS Ranchi
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एसीबी करेगी रसूखदार अधिकारियों की आपराधिक जांच

चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को आपराधिक जांच का जिम्मा सौंपा है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि उन सभी अधिकारियों के खिलाफ (Criminal Liability Investigation) शुरू की जाए जिन्होंने 1964-65 में अधिग्रहित जमीन पर अवैध रूप से नक्शा पास किया और म्यूटेशन की अनुमति दी। अदालत ने कड़े लहजे में कहा कि यदि जांच संतोषजनक नहीं रही, तो मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को भी सौंपा जा सकता है।

1964 में हुआ अधिग्रहण और मुआवजे का सच

हाईकोर्ट ने दस्तावेजों की पड़ताल के बाद यह साफ कर दिया कि रिम्स की स्थापना के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत वर्ष 1964-65 में ही जमीन अधिग्रहित कर ली गई थी। उस समय जमीन मालिकों को (Land Acquisition Compensation) का पूर्ण भुगतान किया जा चुका था, जिससे वह भूमि कानूनी रूप से राज्य सरकार की संपत्ति बन गई थी। इसके बावजूद, राजस्व और अंचल अधिकारियों ने मिलीभगत कर इस सरकारी जमीन की रसीदें काटीं और निजी स्वामित्व के फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए।

अस्पताल परिसर में खड़ी हो गई बहुमंजिला इमारतें

झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना आस्थाना की जांच रिपोर्ट ने रिम्स परिसर की कड़वी हकीकत को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, रिम्स की लगभग सात एकड़ भूमि पर अवैध रूप से मंदिर, आलीशान अपार्टमेंट, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और दुकानें बना दी गई हैं। इस (Illegal Urban Encroachment) के कारण न केवल अस्पताल की विस्तार योजनाएं रुकीं, बल्कि गर्ल्स हॉस्टल के समीप रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा और परिसर की स्वच्छता पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

सरकारी खजाने से नहीं बल्कि दोषियों से वसूला जाएगा हर्जाना

अदालत ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि इस भूमि विवाद से प्रभावित होने वाले लोगों को मुआवजा मिलना चाहिए, लेकिन इसकी भरपाई जनता के टैक्स के पैसों से नहीं होगी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि (Accountability of Public Servants) तय करते हुए हर्जाने की राशि उन दोषी अधिकारियों और बिल्डरों की संपत्ति से वसूली जाए जिन्होंने गलत तरीके से जमीन बेची और खरीदी। यह फैसला भविष्य के लिए एक नजीर बनेगा कि भ्रष्टाचार की कीमत अधिकारियों को अपनी जेब से चुकानी होगी।

बैंकों और रिम्स प्रबंधन (RIMS Ranchi) पर फूटा कोर्ट का गुस्सा

सुनवाई के दौरान अदालत ने उन बैंकों की भी खिंचाई की जिन्होंने बिना उचित जांच-पड़ताल के सरकारी जमीन पर करोड़ों के ऋण (Home Loan Verification Failures) स्वीकृत कर दिए। इसके साथ ही, रिम्स प्रबंधन को भी नहीं बख्शा गया। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि वर्षों तक अतिक्रमण होता रहा और प्रबंधन मूकदर्शक बना रहा। रिम्स प्रशासन को अब अपनी आंतरिक जांच कर उन सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों को चिन्हित करना होगा जिनकी चुप्पी ने इस भू-घोटाले को बढ़ावा दिया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का कड़ा हवाला

अतिक्रमणकारियों ने वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) का सहारा लेकर अपने अवैध कब्जों को वैध बताने की कोशिश की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने (Supreme Court Jurisprudence) और इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार मुआवजा मिल जाने के बाद जमीन पर पुराने मालिकों का कोई अधिकार शेष नहीं रहता और राजस्व विभाग द्वारा जारी कोई भी रसीद इसे बदल नहीं सकती।

बुलडोजर की कार्रवाई और 6 जनवरी की डेडलाइन

हाईकोर्ट ने 72 घंटे के भीतर अतिक्रमण हटाने के अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा है, जिससे अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलने का रास्ता साफ हो गया है। अदालत अब (Judicial Oversight Progress) के तहत छह जनवरी को अगली सुनवाई करेगी, जिसमें एसीबी को अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पेश करनी होगी। रांची नगर निगम और रेरा के अधिकारियों को भी अब अपनी कार्यप्रणाली का जवाब देना होगा, क्योंकि उनकी नाक के नीचे अस्पताल की जमीन पर रिहायशी कॉलोनियां बसती रहीं।

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