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SupremeCourt – यौन अपराध मामलों में अदालतों और पुलिस को मिले नए निर्देश

SupremeCourt- यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई और जांच के दौरान सभी अदालतों तथा पुलिस अधिकारियों को निर्धारित न्यायिक हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा। यह टिप्पणी पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले पर सुनवाई के दौरान सामने आई, जिस पर सर्वोच्च अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की।

पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जिस मामले का उल्लेख किया गया, उसमें पटना हाईकोर्ट ने यह माना था कि महिला के कपड़े उतारने और उसके साथ जबरदस्ती करने की घटना को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोपों को बदलते हुए उसे केवल महिला की मर्यादा भंग करने से संबंधित प्रावधान के तहत दोषी माना था। इस निर्णय का हवाला देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष न्यायिक दृष्टिकोण में सामने आ रही असंगतियों का मुद्दा उठाया।

सर्वोच्च अदालत ने न्यायिक जिम्मेदारी पर दिया जोर

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों का दायित्व है कि वे कानून, उपलब्ध साक्ष्यों और पूर्व के न्यायिक निर्णयों का समुचित अध्ययन कर निर्णय दें। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में शोध और विधिक संदर्भों की अनदेखी उचित नहीं मानी जा सकती। पीठ ने न्यायिक स्टाफ की भूमिका को लेकर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मामलों की तैयारी और कानूनी संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

वर्ष 2008 की घटना से जुड़ा है मामला

यह प्रकरण वर्ष 2008 की एक घटना से संबंधित है। आरोप था कि एक फोटो स्टूडियो में महिला के साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया गया था। निचली अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास और अवैध रूप से बंधक बनाने के आरोप में दोषी ठहराया था। बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए दुष्कर्म के प्रयास से संबंधित धाराएं हटा दीं कि रिकॉर्ड पर प्रवेश (पेनेट्रेशन) या उससे जुड़े चिकित्सीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसके आधार पर सजा को महिला की मर्यादा भंग करने वाले अपराध तक सीमित कर दिया गया।

सभी अदालतों और पुलिस के लिए जारी हुए निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में निर्धारित संवेदनशीलता हैंडबुक का पालन पूरे देश में अनिवार्य होगा। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे सभी पुलिस थानों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें ताकि एफआईआर दर्ज करने और आरोपपत्र दाखिल करने के दौरान निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही, नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा तैयार न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है, जिससे न्यायिक अधिकारियों को आवश्यक मार्गदर्शन मिल सके।

न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता पर रहेगा जोर

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का उद्देश्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील, संतुलित और कानूनसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करना है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में न्यायिक और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली में एकरूपता बनाए रखना आवश्यक है, ताकि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा हो और मामलों की सुनवाई स्थापित कानूनी मानकों के अनुरूप की जा सके।

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