उत्तराखण्ड

Uttarakhand: खोखले वादे और मायूस चेहरे! उत्तराखंड के 10 लाख बच्चों का टूटा भरोसा, क्या सरकारी फाइलों में दब गई मुफ्त कॉपियां…

Uttarakhand: उत्तराखंड के शिक्षा विभाग से एक ऐसी खबर सामने आ रही है जिसने राज्य की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश के करीब दस लाख छात्र-छात्राओं के लिए इस साल की शुरुआत एक बड़ी उम्मीद के साथ हुई थी, लेकिन साल का अंत होते-होते यह उम्मीद पूरी तरह (Government School Education) के ढुलमुल रवैये की भेंट चढ़ गई। सरकार ने बड़े जोर-शोर से घोषणा की थी कि इस सत्र में बच्चों को मुफ्त कॉपियां दी जाएंगी, लेकिन हकीकत यह है कि पूरा शैक्षणिक सत्र बीतने को है और बच्चों के हाथ अब भी खाली हैं।

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कैबिनेट की मंजूरी के बावजूद कछुआ चाल से चलता विभाग

हैरानी की बात यह है कि इस योजना को लेकर सरकार की मंशा साफ थी और अप्रैल 2025 में ही कैबिनेट (Uttarakhand) ने इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी थी। नियमानुसार सत्र शुरू होते ही बच्चों के पास कॉपियां पहुंच जानी चाहिए थीं, लेकिन विभाग ने (Cabinet Proposal Approval) मिलने के बावजूद टेंडर की प्रक्रिया में इतनी देरी कर दी कि अब उसका कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा। यह देरी न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है, बल्कि उन गरीब परिवारों के बजट पर भी भारी पड़ी है जिन्होंने सरकारी भरोसे अपनी जेबें ढीली कीं।

कक्षा 1 से 12वीं तक के छात्रों का अधूरा रहा इंतजार

मुफ्त कॉपियों की यह घोषणा केवल प्राथमिक स्तर तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रदेश के सरकारी और अशासकीय स्कूलों (Uttarakhand) के कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के लाखों विद्यार्थियों को इसका लाभ मिलना था। सरकार ने वादा किया था कि मुफ्त किताबों और (School Uniform Distribution) के बाद अब स्टेशनरी का बोझ भी शिक्षा विभाग उठाएगा। छात्र और अभिभावक हर महीने स्कूल में कॉपियां आने की उम्मीद करते रहे, लेकिन अंत में उन्हें बाजार से महंगे दामों पर कॉपियां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा।

शिक्षा निदेशक का नया फरमान और दिसंबर में टेंडर की सुगबुगाहट

जब पूरा सत्र लगभग समाप्त होने की कगार पर है, तब जाकर माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने इस संबंध में मुख्य शिक्षा अधिकारियों (CEO) को निर्देश जारी किए हैं। विभागीय (Education Department Instructions) में कहा गया है कि अब शैक्षिक सत्र 2025-26 के लिए छात्र-छात्राओं को कॉपियां उपलब्ध कराई जानी हैं। इसके लिए 4 दिसंबर 2025 को ऑनलाइन ई-निविदा (टेंडर) आमंत्रित की गई है। सवाल यह उठता है कि जो प्रक्रिया साल की शुरुआत में पूरी हो जानी चाहिए थी, उसे दिसंबर में शुरू करने का क्या अर्थ है?

ई-निविदा प्रक्रिया और प्रशासनिक देरी का असली सच

दिसंबर महीने में ऑनलाइन ई-निविदा आमंत्रित करने का मतलब है कि कॉपियां छपने और स्कूलों तक पहुंचने में अभी और कई महीनों का समय लगेगा। विभाग की इस (Online Tender Process) की टाइमिंग पर सवाल उठना लाजमी है। क्या अधिकारी यह भूल गए कि सत्र अप्रैल से शुरू होता है? इस तरह की लेटलतीफी से स्पष्ट होता है कि सरकारी तंत्र में तालमेल की भारी कमी है, जिसका खामियाजा उन बच्चों को भुगतना पड़ रहा है जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं।

अभिभावकों पर बढ़ा आर्थिक बोझ और बच्चों की निराशा

पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए सरकारी स्कूलों में मिलने वाली मुफ्त सुविधाएं बहुत मायने रखती हैं। जब सरकार ने मुफ्त कॉपियों का (Financial Burden on Parents) कम करने का वादा किया, तो कई अभिभावकों ने अपनी सीमित आय को अन्य जरूरतों के लिए बचा कर रखा था। लेकिन कॉपियां न मिलने के कारण उन्हें ऐन वक्त पर कर्ज लेकर या अन्य खर्चों में कटौती कर बच्चों की पढ़ाई जारी रखनी पड़ी। बच्चों के मन में भी सरकार के इन वादों के प्रति अब एक अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।

क्या अगले सत्र में भी दोहराई जाएगी यही कहानी?

अब विभाग (Uttarakhand) अगले सत्र यानी 2025-26 की तैयारी का दावा कर रहा है, लेकिन वर्तमान सत्र की विफलता ने अभिभावकों के मन में डर पैदा कर दिया है। शिक्षा विभाग के (Academic Session Planning) में अगर इसी तरह की खामियां रहीं, तो अगले साल भी बच्चों को खाली हाथ रहना पड़ सकता है। विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए इसे ‘चुनावी जुमला’ करार दिया है। लोगों की मांग है कि इस देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में बच्चों के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो।

भविष्य की राह और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दरकार

Uttarakhand जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में सरकारी स्कूलों की मजबूती ही शिक्षा का आधार है। अगर (Free Education Materials) समय पर नहीं मिलती हैं, तो ड्रॉप-आउट रेट बढ़ने का खतरा रहता है। सरकार को चाहिए कि वह केवल घोषणाएं न करे, बल्कि उनके क्रियान्वयन के लिए एक सख्त समय सीमा निर्धारित करे। 10 लाख बच्चों का इंतजार खत्म होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अगले सत्र की कॉपियां कम से कम समय पर उनके बस्ते में पहुंच जाएं, न कि सरकारी गोदामों या टेंडर की फाइलों में अटकी रहें।

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