NATO – अंकारा शिखर सम्मेलन से पहले रक्षा खर्च और ईरान मुद्दे पर बढ़ी चुनौती
NATO- इस सप्ताह अंकारा में होने जा रहे नाटो शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। ऐसे समय में यह बैठक आयोजित हो रही है जब गठबंधन के भीतर कई अहम मुद्दों को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। रक्षा बजट बढ़ाने की योजना, हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और संगठन की भविष्य की रणनीति जैसे विषय सम्मेलन के प्रमुख एजेंडे में शामिल माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन मतभेदों के बीच सदस्य देश साझा रणनीति बनाने की कोशिश करेंगे।

ईरान से जुड़े घटनाक्रम पर अलग-अलग रुख
हाल में ईरान को लेकर अमेरिका द्वारा किए गए सैन्य अभियान पर नाटो के सदस्य देशों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही। कई देशों ने परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के उद्देश्य का समर्थन तो किया, लेकिन सैन्य कार्रवाई में प्रत्यक्ष भागीदारी से दूरी बनाए रखी। रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े सुरक्षा प्रयासों में भी कई यूरोपीय देशों ने सक्रिय सैन्य सहयोग देने में सावधानी बरती। इस स्थिति पर अमेरिका की ओर से सहयोगी देशों की प्रतिबद्धता को लेकर सवाल भी उठाए गए।
क्षेत्रीय स्थिरता बनी यूरोपीय देशों की प्राथमिकता
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अधिकांश यूरोपीय देश इस पूरे घटनाक्रम को केवल अमेरिका के समर्थन के नजरिए से नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की स्थिरता के संदर्भ में भी देख रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने, जवाबी कार्रवाई की आशंका बढ़ने और नए प्रवासन संकट जैसी चुनौतियां पैदा हो सकती थीं। कई देशों के सामने पहले से मौजूद घरेलू आर्थिक और सामाजिक दबाव भी उनके फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।
पुराने सैन्य अभियानों के अनुभव का असर
विदेश नीति विश्लेषकों का कहना है कि इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे पिछले सैन्य अभियानों से मिले अनुभवों ने यूरोपीय सरकारों को अधिक सतर्क बना दिया है। उनका मानना है कि बिना व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन और स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य के किसी भी सैन्य अभियान में शामिल होने को लेकर अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सावधानी बरती जा रही है। यही वजह है कि कई देशों ने हालिया घटनाक्रम में सीमित राजनीतिक समर्थन तक ही अपनी भूमिका रखी।
रक्षा बजट बढ़ाने के लक्ष्य पर होगी चर्चा
अंकारा सम्मेलन में रक्षा व्यय बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुख रहेगा। पिछले वर्ष हुए समझौते के तहत सदस्य देशों ने वर्ष 2035 तक रक्षा और सुरक्षा से जुड़े खर्च को अपने सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य स्वीकार किया था। इस प्रस्ताव को अमेरिका की उस रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है जिसके तहत यूरोपीय देशों से अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों में अधिक योगदान की अपेक्षा की जा रही है। हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि सभी देशों के लिए इस लक्ष्य को समय पर हासिल करना आसान नहीं होगा।
आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां बनीं बड़ी बाधा
विश्लेषकों के अनुसार, कई यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति इस लक्ष्य के सामने बड़ी चुनौती बन सकती है। धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और वृद्ध होती आबादी जैसे कारक रक्षा खर्च में भारी वृद्धि को कठिन बना सकते हैं। इसके साथ ही घरेलू राजनीति भी सरकारों के लिए अहम परीक्षा साबित हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में नागरिक स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसी योजनाओं को सैन्य बजट की तुलना में अधिक प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में सरकारों को अतिरिक्त रक्षा खर्च के पक्ष में जनसमर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
सम्मेलन से पहले कई शहरों में विरोध प्रदर्शन
शिखर सम्मेलन से पहले तुर्किये के अंकारा, इस्तांबुल और इजमिर सहित कई शहरों में नाटो के खिलाफ प्रदर्शन भी दर्ज किए गए। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा बजट में वृद्धि और संगठन की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इसे शांति के बजाय सैन्य टकराव को बढ़ावा देने वाला मंच बताया। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण पर अधिक संसाधन खर्च करने की मांग उठाई। इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में नीदरलैंड्स और स्पेन सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों में भी देखने को मिले हैं।