SupremeCourt – दहेज उत्पीड़न मामले में ससुराल पक्ष को मिली बड़ी राहत
SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में दहेज उत्पीड़न और घरेलू क्रूरता के आरोपों से जुड़े मामले में महिला के ससुराल पक्ष को राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि केवल किसी महिला को वैवाहिक जीवन में “समायोजन” करने की सलाह देना या पति का पक्ष लेना अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर परिवार के अन्य सदस्यों पर मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का आदेश
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज मामले को खत्म करने से इनकार किया गया था। सुप्रीम Court ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत विवादों के समाधान के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी आरोपी के खिलाफ ठोस तथा स्पष्ट आरोप होना जरूरी है।
वैवाहिक विवाद से जुड़ा था पूरा मामला
मामला वर्ष 2019 में हुए विवाह के बाद उत्पन्न पारिवारिक विवाद से जुड़ा था। शिकायतकर्ता महिला ने वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश के गुना में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें पति और उसके परिवार के सदस्यों पर दहेज मांगने, मानसिक प्रताड़ना देने और घरेलू हिंसा करने के आरोप लगाए गए थे। महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि उस पर अतिरिक्त धन लाने का दबाव बनाया गया और उसकी गतिविधियों पर नजर रखी गई।
अदालत ने आरोपों को बताया सामान्य
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिकायत में ससुराल पक्ष के खिलाफ किसी विशेष घटना या प्रत्यक्ष भूमिका का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। अदालत के अनुसार, केवल यह कहना कि परिवार के सदस्यों ने पति का समर्थन किया या विवाद में हस्तक्षेप नहीं किया, आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकता। न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक मामलों में हर रिश्तेदार को बिना ठोस आधार के आरोपी बनाना कानून की भावना के खिलाफ है।
विशिष्ट आरोप जरूरी होने पर जोर
न्यायमूर्ति कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा जैसे मामलों में प्रत्येक आरोपी की अलग भूमिका स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि आरोप ऐसे होने चाहिए जो प्रथम दृष्टया यह दर्शाएं कि संबंधित व्यक्ति ने प्रताड़ना, दहेज मांग या हिंसा में सक्रिय भागीदारी की थी। केवल पारिवारिक संबंध होने के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
निष्क्रिय व्यवहार को नहीं माना अपराध
अदालत ने यह भी कहा कि परिवार के कुछ सदस्य विवाद के दौरान निष्क्रिय रह सकते हैं या हस्तक्षेप करने से बच सकते हैं। यह व्यवहार नैतिक रूप से सही या गलत हो सकता है, लेकिन जब तक सक्रिय मिलीभगत साबित न हो, तब तक इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने शिकायतकर्ता के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि ससुराल पक्ष ने पति को रोकने की कोशिश नहीं की।
विवाह समाप्त होने का भी पड़ा असर
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि पति-पत्नी के बीच विवाह संबंध पहले ही समाप्त हो चुका है। ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत ससुराल पक्ष के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं बचता। कोर्ट ने कहा कि हालांकि महिला अपने पति के खिलाफ उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखना उचित नहीं होगा।