CasteCensus – सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की जाति जनगणना को चुनौती देने वाली याचिका
CasteCensus – सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के जाति जनगणना कराने के फैसले के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यह पूरी तरह सरकार की नीतिगत प्रक्रिया से जुड़ा विषय है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि सरकार के लिए पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या जानना जरूरी है ताकि उनके लिए बेहतर योजनाएं तैयार की जा सकें।

यह मामला उस समय सामने आया जब याचिकाकर्ता ने अदालत में दावा किया कि सरकार के पास पहले से ही जातियों से संबंधित पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं और अलग से जाति आधारित जनगणना कराने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
नीति से जुड़ा विषय मानकर कोर्ट ने दी टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जनगणना का स्वरूप तय करना सरकार का अधिकार है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली भी शामिल थे।
अदालत ने कहा कि यदि सरकार पिछड़े वर्गों की संख्या और उनकी सामाजिक स्थिति का आकलन करना चाहती है तो यह प्रशासनिक और नीतिगत जरूरत का हिस्सा माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी बनाने के लिए सटीक आंकड़े होना जरूरी है।
याचिकाकर्ता ने दी थी अलग दलील
याचिकाकर्ता सुधाकर गुमुला ने स्वयं अदालत में उपस्थित होकर अपनी बात रखी। उनका कहना था कि देश में पहले से उपलब्ध सामाजिक और जातिगत आंकड़े पर्याप्त हैं और नई जाति जनगणना से अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस तरह की प्रक्रिया से सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त आधार नहीं माना और कहा कि यह फैसला सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं के दायरे में आता है।
2027 में होगी अगली राष्ट्रीय जनगणना
केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वर्ष 2027 में होने वाली जनगणना में जातियों का विस्तृत डेटा भी शामिल किया जाएगा। यह देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। खास बात यह है कि 1931 के बाद पहली बार जातियों की व्यापक गणना की जाएगी।
सरकारी सूत्रों के अनुसार आगामी जनगणना पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संचालित की जाएगी। इसके लिए तकनीकी ढांचे और डेटा संग्रह प्रणाली को आधुनिक बनाया जा रहा है। माना जा रहा है कि डिजिटल प्रक्रिया से आंकड़ों के विश्लेषण और रिकॉर्ड प्रबंधन में आसानी होगी।
सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बढ़ी चर्चा
जाति जनगणना का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा विषय बना हुआ है। कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। उनका तर्क है कि इससे विभिन्न समुदायों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति सामने आ सकेगी।
वहीं कुछ पक्षों ने इस प्रक्रिया पर सवाल भी उठाए हैं। उनका मानना है कि जाति आधारित आंकड़ों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य योजनाओं को अधिक प्रभावी और लक्षित बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब जाति जनगणना को लेकर सरकार की तैयारियों को कानूनी स्तर पर राहत मिली है और आगे की प्रक्रिया तय समय के अनुसार आगे बढ़ने की संभावना है।