FloorTest – सुप्रीम कोर्ट से टीवीके विधायक सेतुपति को मिली बड़ी राहत
FloorTest – तमिलनाडु की राजनीति से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टीवीके विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति को अंतरिम राहत देते हुए मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें उन्हें विधानसभा के फ्लोर टेस्ट और अन्य मतदान प्रक्रियाओं में भाग लेने से रोका गया था। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद सेतुपति अब सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकेंगे।

हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि चुनाव से जुड़े विवाद पर सीधे हाई कोर्ट में इस तरह अंतरिम आदेश कैसे जारी किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाई कोर्ट में चल रही पूरी कार्यवाही पर भी रोक लगा दी है।
अदालत ने डीएमके नेता केआर पेरियाकरुप्पन समेत अन्य पक्षकारों को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। सेतुपति ने हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें विश्वास मत या शक्ति परीक्षण में मतदान से रोक दिया गया था।
एक वोट से जीते थे सेतुपति
यह पूरा विवाद शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से जुड़ा है। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, आर श्रीनिवास सेतुपति ने डीएमके उम्मीदवार केआर पेरियाकरुप्पन को केवल एक वोट के बेहद मामूली अंतर से हराया था। सेतुपति को 83,365 वोट मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 83,364 मत प्राप्त हुए थे।
इतने कम अंतर से आए नतीजे के बाद पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि एक पोस्टल बैलेट गलत निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया गया था और बाद में उसे वैध रूप से गिनती में शामिल नहीं किया गया। उनका आरोप है कि इस चूक का असर अंतिम नतीजे पर पड़ा।
हाई कोर्ट ने जताई थी गंभीर चिंता
मद्रास हाई कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने इस मामले को सामान्य मतगणना विवाद से अलग मानते हुए संवैधानिक महत्व का मुद्दा बताया था। अदालत ने कहा था कि जब चुनाव परिणाम केवल एक वोट से तय हुआ हो, तब हर मत का महत्व और बढ़ जाता है।
हाई कोर्ट ने मतगणना रिकॉर्ड, पोस्टल बैलेट और संबंधित वीडियो फुटेज को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि सरकारी रिकॉर्ड में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आंकड़ों को लेकर अंतर सामने आया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया था कि उसने सेतुपति का निर्वाचन रद्द नहीं किया है। केवल उन्हें तब तक सदन में वोटिंग से दूर रहने को कहा गया था, जब तक मामले पर आगे सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।
चुनाव आयोग ने उठाए कानूनी सवाल
इस पूरे मामले में चुनाव आयोग ने भी हाई कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। आयोग का कहना था कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद किसी भी विवाद का समाधान केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से किया जा सकता है। आयोग ने दलील दी कि अंतरिम आदेश के जरिए किसी विधायक को सदन की कार्यवाही से रोकना उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।
उधर, टीवीके सरकार ने इसी बीच विधानसभा में बहुमत परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। राजनीतिक हलकों में अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर नजर बनी हुई है, क्योंकि यह मामला चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक व्यवस्था दोनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।