बिहार

EmergencyEra – निशिकांत दुबे ने आपातकाल को बताया लोकतंत्र का काला दौर

EmergencyEra – भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने आपातकाल के दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक कठिन और विवादित अध्याय बताते हुए उस समय हुई घटनाओं का जिक्र किया है। उन्होंने अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता स्नेहलता रेड्डी के मामले को सामने रखते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान कई लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया और उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए अपने संदेश में दुबे ने दावा किया कि 2 मई 1976 को तत्कालीन सरकार ने स्नेहलता रेड्डी को गिरफ्तार किया था। उनके अनुसार, रेड्डी पर किसी गंभीर अपराध का आरोप नहीं था, बल्कि उनका संबंध समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस से होने के कारण उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर उठाए सवाल

निशिकांत दुबे ने अपने बयान में कहा कि उस दौर में कई लोगों को राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि स्नेहलता रेड्डी के परिवार के सदस्यों को भी परेशान किया गया और उनके बुजुर्ग पिता तक को हिरासत में लिया गया था।

दुबे के मुताबिक, रेड्डी को लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखा गया और हिरासत के दौरान उनकी सेहत लगातार बिगड़ती रही। उन्होंने कहा कि बाद में गंभीर स्वास्थ्य स्थिति में उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उनका निधन हो गया। भाजपा सांसद ने इसे आपातकाल के दौरान हुए दमन का उदाहरण बताया।

स्नेहलता रेड्डी का सांस्कृतिक योगदान

स्नेहलता रेड्डी दक्षिण भारतीय सिनेमा और रंगमंच की जानी-मानी कलाकार थीं। उनका जन्म वर्ष 1932 में हुआ था और उन्होंने कन्नड़ तथा तेलुगु फिल्मों में अपनी पहचान बनाई थी। कला और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी सक्रियता उन्हें अलग पहचान देती थी।

उन्होंने चर्चित फिल्म ‘संस्कार’ में भी अभिनय किया था। इस फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली थी और इसे 1970 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। थिएटर और सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता के कारण वह सांस्कृतिक जगत में प्रभावशाली व्यक्तित्व मानी जाती थीं।

मीसा कानून के तहत हुई थी गिरफ्तारी

आपातकाल के दौरान स्नेहलता रेड्डी को मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। उस समय सरकार ने कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों पर इसी कानून के तहत कार्रवाई की थी।

रिपोर्टों के अनुसार, उनका नाम बड़ौदा डायनामाइट मामले से जोड़ा गया था। हालांकि बाद में दाखिल आरोपपत्र में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। इसके बावजूद उन्हें कई महीनों तक जेल में रखा गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आपातकाल के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए थे, जिनमें हिरासत और नागरिक अधिकारों को लेकर सवाल उठे।

आपातकाल पर फिर तेज हुई राजनीतिक बहस

निशिकांत दुबे के बयान के बाद एक बार फिर आपातकाल को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। भाजपा लगातार आपातकाल के दौर को लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव और नागरिक स्वतंत्रता में कटौती का समय बताती रही है। वहीं कांग्रेस की ओर से पहले भी कहा जाता रहा है कि उस दौर की परिस्थितियां अलग थीं और बाद में चुनाव कराकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल की गई थी।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकाल का मुद्दा भारतीय राजनीति में समय-समय पर चर्चा का विषय बनता रहा है। खासकर जब लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर बहस होती है, तब उस दौर की घटनाओं का उल्लेख फिर सामने आने लगता है।

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