राष्ट्रीय

CRPFValour – कच्छ के रण में 150 जवानों ने रोकी थी दुश्मन की बड़ी टुकड़ी

CRPFValour – केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, जिसे देश का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल माना जाता है, अपने साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता है। इसकी वीरता का एक ऐसा अध्याय 1965 में दर्ज हुआ, जिसने न केवल देश बल्कि दुनिया का ध्यान खींचा। गुजरात के कच्छ के रण में सीमित संसाधनों और कम संख्या के बावजूद सीआरपीएफ के जवानों ने पाकिस्तानी सेना के बड़े हमले को विफल कर दिया था। यह घटना आज भी अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल का प्रतीक मानी जाती है।

कच्छ के रण में हुआ था निर्णायक मुकाबला

अप्रैल 1965 में पाकिस्तान ने भारतीय सीमा पर दबाव बनाने के उद्देश्य से एक सैन्य अभियान की शुरुआत की। इस योजना के तहत कच्छ के रण में स्थित ‘सरदार पोस्ट’ और ‘टाक पोस्ट’ को निशाना बनाया गया। उस समय सीमा की सुरक्षा का जिम्मा सीआरपीएफ और गुजरात पुलिस के पास था, क्योंकि सीमा सुरक्षा बल का गठन बाद में हुआ था। 9 अप्रैल की सुबह करीब तीन बजे पाकिस्तानी सेना की 51वीं ब्रिगेड ने भारी संख्या में सैनिकों के साथ हमला बोल दिया।

कम संख्या में होते हुए भी डटे रहे जवान

सीआरपीएफ की दूसरी बटालियन की केवल दो कंपनियां, जिनमें करीब 150 जवान शामिल थे, इस क्षेत्र में तैनात थीं। उनके सामने लगभग 3500 पाकिस्तानी सैनिकों की पूरी ब्रिगेड थी, जिसके पास आधुनिक हथियार और तोपखाना भी मौजूद था। इसके बावजूद भारतीय जवानों ने पीछे हटने के बजाय मोर्चा संभाले रखा और करीब 14 घंटे तक लगातार मुकाबला किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका मनोबल कमजोर नहीं पड़ा।

दुश्मन को पीछे हटने पर किया मजबूर

इस लंबे और कठिन संघर्ष के दौरान सीआरपीएफ के जवानों ने असाधारण साहस का परिचय दिया। उन्होंने पाकिस्तानी सेना के 34 सैनिकों को मार गिराया, जिनमें दो अधिकारी भी शामिल थे, जबकि चार सैनिकों को जीवित पकड़ लिया गया। भारी नुकसान उठाने के बाद पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस लड़ाई में सीआरपीएफ के सात जवान वीरगति को प्राप्त हुए, जिनका बलिदान आज भी प्रेरणा देता है।

शौर्य दिवस के रूप में मनाई जाती है यादगार तारीख

इस ऐतिहासिक जीत की स्मृति में हर साल 9 अप्रैल को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन सीआरपीएफ के जवानों की बहादुरी, अनुशासन और समर्पण को सम्मान देने का अवसर होता है। इस घटना को दुनिया के उन दुर्लभ उदाहरणों में गिना जाता है, जहां एक छोटी टुकड़ी ने एक बड़ी सैन्य शक्ति को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

रणनीति और हौसले ने बदली लड़ाई की दिशा

इस संघर्ष की खास बात यह थी कि सीआरपीएफ के पास सीमित हथियार थे, जबकि विरोधी सेना पूरी तरह सुसज्जित थी। इसके बावजूद भारतीय जवानों ने रणनीति, समन्वय और अदम्य हौसले के दम पर स्थिति को अपने पक्ष में कर लिया। यह घटना आज भी सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण और प्रेरणा का अहम हिस्सा मानी जाती है, जो यह बताती है कि संख्या और संसाधनों से अधिक महत्वपूर्ण होता है साहस और दृढ़ संकल्प।

Related Articles

Back to top button

Adblock Detected

Please disable your AdBlocker first, and then you can watch everything easily.