EnergyCrisis – पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत में एलपीजी आपूर्ति पर असर
EnergyCrisis – पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को तीन सप्ताह से अधिक समय हो चुका है और इसका असर अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान पर हमलों और उसके जवाब में तेहरान की कार्रवाई ने हालात को और जटिल बना दिया है। इस बीच ईरान ने न केवल इस्राइल बल्कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाया है। सबसे अहम कदम होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना रहा, जो खाड़ी देशों को दुनिया से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है। इस फैसले का सीधा असर भारत समेत कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है, खासकर एलपीजी के क्षेत्र में।

कच्चे तेल के मुकाबले एलपीजी पर ज्यादा दबाव
भारत के सामने मौजूदा संकट में सबसे बड़ा सवाल यह है कि कच्चे तेल की तुलना में एलपीजी की कमी ज्यादा क्यों महसूस हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह दोनों ईंधनों की आपूर्ति और भंडारण व्यवस्था में अंतर है। भारत ने समय के साथ कच्चे तेल के आयात के स्रोतों को विविध बनाया है और अब वह करीब 40 देशों से तेल खरीदता है। इसके साथ ही देश के पास कच्चे तेल के लिए पर्याप्त भंडारण क्षमता भी मौजूद है, जिससे आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में कुछ समय तक जरूरत पूरी की जा सकती है।
एलपीजी आयात में सीमित विकल्प
एलपीजी के मामले में स्थिति अलग है। भारत अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है और इसका अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। अनुमान के अनुसार, भारत के कुल एलपीजी आयात का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में जब होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर असर पड़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव आपूर्ति पर दिखाई देता है। वैकल्पिक स्रोतों की सीमित उपलब्धता इस समस्या को और बढ़ा देती है।
भंडारण क्षमता की कमी बनी बड़ी चुनौती
कच्चे तेल के लिए भारत ने विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर जैसे स्थानों पर रणनीतिक भंडार विकसित किए हैं। वाणिज्यिक भंडारण को मिलाकर देश के पास लगभग 74 दिनों की जरूरत पूरी करने की क्षमता है। इसके विपरीत एलपीजी के लिए ऐसा कोई बड़ा राष्ट्रीय भंडार नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में एलपीजी का कुल भंडारण लगभग 22 दिनों के आसपास ही है, जिसमें बॉटलिंग प्लांट का सीमित स्टॉक भी शामिल है। इस कारण आपूर्ति में थोड़ी भी बाधा आने पर संकट तेजी से महसूस होने लगता है।
जस्ट-इन-टाइम मॉडल पर निर्भर व्यवस्था
भारत में एलपीजी वितरण प्रणाली काफी हद तक निरंतर आपूर्ति पर आधारित है। करीब 33 करोड़ उपभोक्ताओं तक गैस पहुंचाने वाला नेटवर्क जस्ट-इन-टाइम मॉडल पर काम करता है। इसका मतलब है कि बड़े पैमाने पर भंडारण के बजाय नियमित आयात और त्वरित वितरण पर भरोसा किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में यह व्यवस्था प्रभावी रहती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संकट के समय यही मॉडल कमजोर कड़ी बन जाता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का असर
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अहम मार्ग माना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला अधिकांश तेल और गैस इसी रास्ते से दुनिया भर में पहुंचता है। ऐसे में इसके बंद होने से न केवल आपूर्ति बाधित होती है, बल्कि परिवहन लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं। भारत, जो अपनी एलपीजी जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से प्राप्त करता है, इस स्थिति में सीधे प्रभावित हुआ है।
आगे की रणनीति पर विचार जरूरी
मौजूदा हालात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को एलपीजी के क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति पर काम करने की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भंडारण क्षमता बढ़ाने, आयात के स्रोतों में विविधता लाने और वैकल्पिक ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने जैसे कदम भविष्य में ऐसे संकटों से निपटने में मदद कर सकते हैं। फिलहाल सरकार आपूर्ति संतुलन बनाए रखने के प्रयास में जुटी है, लेकिन स्थिति सामान्य होने तक चुनौतियां बनी रह सकती हैं