उत्तराखण्ड

SolidWaste – उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन के लिए शराब बोतलों पर नया सेस प्रस्तावित

SolidWaste – उत्तराखंड सरकार राज्य में बढ़ती कचरा समस्या से निपटने के लिए नया आर्थिक मॉडल तैयार कर रही है। शहरी विकास विभाग ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से शराब की प्रत्येक बोतल पर अतिरिक्त उपकर लगाने का प्रस्ताव तैयार किया है। प्रस्ताव के अनुसार, प्रति बोतल एक रुपये का अतिरिक्त शुल्क लिया जाएगा और इससे प्राप्त राशि का उपयोग राज्य के सभी नगर निकायों में सफाई और कचरा निस्तारण व्यवस्था को बेहतर बनाने में किया जाएगा।

प्रदेश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पर्यटन गतिविधियों के कारण ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में कचरा एकत्र करना और उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना प्रशासन के लिए खर्चीला और जटिल काम माना जा रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए शहरी विकास विभाग ने स्थायी वित्तीय संसाधन जुटाने की दिशा में यह कदम उठाया है।

नगर निकायों को मिलेगी आर्थिक मदद

शहरी विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य के कई नगर निकाय सीमित बजट में सफाई व्यवस्था चला रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों में जहां जनसंख्या का दबाव अधिक है, वहीं पहाड़ी इलाकों में परिवहन और संसाधनों की कमी के कारण कचरा प्रबंधन की लागत बढ़ जाती है।

सचिव शहरी विकास नितेश कुमार झा ने बताया कि विभाग ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नियमित खर्चों को ध्यान में रखते हुए यह प्रस्ताव तैयार किया है। इसे जल्द ही मुख्य सचिव के समक्ष रखा जाएगा। विभाग का उद्देश्य है कि नगर निकायों को स्थायी आर्थिक सहायता मिले ताकि सफाई व्यवस्था और कचरा निस्तारण की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया जा सके।

पहले से लागू हैं तीन तरह के सेस

वर्तमान में राज्य सरकार आबकारी नीति के तहत शराब की प्रत्येक बोतल पर तीन रुपये का अतिरिक्त शुल्क ले रही है। यह राशि अलग-अलग सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों के लिए निर्धारित की गई है। इसमें एक रुपया गो सेवा, एक रुपया महिला कल्याण और एक रुपया खेल गतिविधियों के लिए उपयोग किया जाता है।

अब प्रस्तावित योजना के तहत शहरी विकास विभाग के लिए भी एक अतिरिक्त रुपया जोड़े जाने की तैयारी है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय सरकार स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद ही लिया जाएगा।

राज्य में बढ़ रही कचरे की समस्या

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में प्रतिदिन 2100 टन से अधिक ठोस अपशिष्ट निकल रहा है। इसमें घरेलू कचरे के साथ पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट भी शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के तहत राज्य में केवल 40 से 45 प्रतिशत कचरे का ही प्रभावी प्रबंधन हो पा रहा है।

प्रदेश में आज भी 60 से अधिक डंपिंग साइट मौजूद हैं, जहां वर्षों पुराना कचरा जमा है। इन स्थानों पर करीब 23 लाख मीट्रिक टन से अधिक पुराना ठोस अपशिष्ट पड़ा हुआ है। कई डंपिंग साइट पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई हैं।

पर्यावरण संरक्षण पर रहेगा फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो नगर निकायों को नियमित आय का एक नया स्रोत मिलेगा। इससे कचरा संग्रहण, परिवहन और वैज्ञानिक निस्तारण की योजनाओं को गति मिल सकती है। खासकर पर्यटन स्थलों और पहाड़ी शहरों में स्वच्छता व्यवस्था सुधारने में मदद मिलने की उम्मीद है।

हालांकि कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल अतिरिक्त शुल्क लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। इसके साथ कचरा पृथक्करण, रीसाइक्लिंग और जनजागरूकता पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी होगा।

फिलहाल प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय का इंतजार है, लेकिन राज्य सरकार की इस पहल को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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