ClimateChange – मध्य हिमालय में बदलता मौसम बढ़ा रहा पर्यावरण और पलायन की चुनौती
ClimateChange- मध्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल वैज्ञानिक अध्ययनों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका असर पर्यावरण, कृषि और लोगों के दैनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती द्वारा किए गए एक अध्ययन में उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में बदलती जलवायु के कारण प्राकृतिक संसाधनों, खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे प्रभावों का उल्लेख किया गया है। अध्ययन के अनुसार, लगातार बदलते मौसम ने पहाड़ी क्षेत्रों के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

खेती और आजीविका पर पड़ा असर
अध्ययन में बताया गया है कि मौसम के बदलते स्वरूप का सबसे अधिक असर कृषि और बागवानी पर पड़ा है। कई पारंपरिक फसलों का उत्पादन लगातार घटा है, जबकि कुछ स्थानीय फसलें अब सीमित क्षेत्रों तक सिमट गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ग्रामीण परिवारों की आय प्रभावित हुई है और रोजगार के अवसर कम होने के कारण पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग बेहतर आजीविका की तलाश में बाहर जा चुके हैं और अनेक गांव लगभग खाली हो चुके हैं।
जलस्रोत और हिमालयी पारिस्थितिकी पर बढ़ता दबाव
शोध में यह भी सामने आया है कि पारंपरिक जलस्रोतों का जलस्तर लगातार घट रहा है। भूमि की नमी कम होने और वर्षा जल के पर्याप्त रूप से जमीन में नहीं समाने के कारण कई क्षेत्रों में भूजल स्तर प्रभावित हुआ है। इससे पेयजल की उपलब्धता और सिंचाई दोनों पर असर पड़ रहा है। अध्ययन के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पति संरचना में भी परिवर्तन देखा जा रहा है। बढ़ते तापमान के कारण चीड़ के जंगल ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रहे हैं, जबकि बांज जैसे पारंपरिक वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं। विशेषज्ञ इसे जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती मानते हैं।
हिमनद और वर्षा के बदलते स्वरूप पर चिंता
अध्ययन में पिछले तीन दशकों के दौरान हिमावरण में कमी और हिमनदों के तेजी से पिघलने की प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया गया है। इसके प्रभाव से पर्वतीय नदियों के जल प्रवाह पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में इन बदलावों को अधिक स्पष्ट बताया गया है। शोध के अनुसार, वर्षा के पैटर्न में बदलाव के कारण कई क्षेत्रों में कभी अत्यधिक बारिश तो कभी लंबे समय तक शुष्क मौसम जैसी स्थितियां देखने को मिल रही हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता जोखिम
प्रो. सती के अध्ययन के अनुसार, अनियमित वर्षा और चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि के कारण बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ा है। अध्ययन में वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक आपदाओं का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन और जलवायु अनुकूल विकास नीतियों पर प्राथमिकता के साथ काम करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में संभावित जोखिमों को कम किया जा सके।