BadrinathTemple – चढ़ावा विवाद पर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने, आरोपों का दौर तेज…
BadrinathTemple- बदरीनाथ मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित अनियमितता के मामले को लेकर उत्तराखंड में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक मंचों या सड़क पर बहस करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास तथ्य हैं तो उन्हें मंदिर परिसर में आकर प्रस्तुत करना चाहिए।

नियुक्ति और जिम्मेदारी को लेकर सफाई
हेमंत द्विवेदी ने कांग्रेस की ओर से लगाए गए उस आरोप को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी कर्मचारी प्रमोद नौटियाल की गणना ड्यूटी में नियुक्ति उनके कार्यकाल में हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित कर्मचारी अप्रैल 2025 से इस जिम्मेदारी में तैनात था, जबकि उस समय उन्होंने बीकेटीसी अध्यक्ष का पदभार नहीं संभाला था। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर समिति अधिनियम के तहत मंदिर कोष का उपयोग केवल निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है।
पुराने फैसलों पर भी उठाए सवाल
बीकेटीसी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन के दौरान कुछ ऐसे मंदिरों के लिए भी धन स्वीकृत किया गया, जो समिति के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते थे। उनका दावा है कि उस समय लिए गए निर्णयों से जुड़े दस्तावेज और बोर्ड बैठक के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एक कर्मचारी को नियमों की अनदेखी करते हुए पदोन्नति दिए जाने के मामले में भी कई सवाल उठते हैं।
कांग्रेस ने सरकार पर साधा निशाना
दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा के आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बहस की चुनौती देने के बावजूद बीकेटीसी अध्यक्ष निर्धारित समय पर नहीं पहुंचे। उनके अनुसार, इससे यह संदेश जाता है कि सरकार और समिति के पास आरोपों का ठोस जवाब नहीं है। गोदियाल ने कहा कि उनके कार्यकाल में मंदिरों के विकास और जीर्णोद्धार के लिए धन स्वीकृत किया गया था, जबकि चढ़ावे से जुड़ी किसी भी अनियमितता से उनका कोई संबंध नहीं है।
नियुक्ति प्रक्रिया और विकास कार्यों का दिया विवरण
गोदियाल ने बताया कि संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति वर्ष 2003 में हुई थी और उसका नियमितीकरण बाद में शासन की स्वीकृति मिलने के बाद किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि बिनसर मंदिर और पोखरी स्थित शिव मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए बोर्ड की मंजूरी के बाद ही धनराशि जारी की गई थी। उनके अनुसार, बाद में सत्ता परिवर्तन के बाद कुछ विकास कार्य रोक दिए गए, जिन्हें बाद में दोबारा स्वीकृति मिली।
जांच की मांग पर भी उठाए सवाल
कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी पूछा कि यदि उनके कार्यकाल में किसी प्रकार की अनियमितता हुई थी तो पिछले कई वर्षों में उसकी जांच क्यों नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि मंदिर प्रशासन से जुड़े संवेदनशील कार्यों में नियुक्ति और जिम्मेदारी तय करने के स्पष्ट नियम हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं और मामला राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।