Ankita Bhandari Murder Case: इंसाफ की दहलीज पर अंकिता! क्या सीबीआई खोल पाएगी उस वीआईपी राज…
Ankita Bhandari Murder Case: अंकिता भंडारी हत्याकांड ने एक बार फिर पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया है। वादियों की शांति अब नारों और न्याय की मांग में तब्दील हो चुकी है, जहां हर नागरिक की आंखों में एक ही सवाल है कि आखिर उस मासूम बेटी को इंसाफ कब मिलेगा। जनभावनाओं के इस प्रचंड दबाव और (Political Protest Movements) के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बड़ा फैसला लेते हुए इस संवेदनशील मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की सिफारिश कर दी है। यह फैसला राज्यभर में चल रहे कांग्रेस और सामाजिक संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के बाद आया है।

माता-पिता की गुहार और धामी सरकार का झुकना
इस कानूनी मोड़ की पटकथा तब लिखी गई जब मुख्यमंत्री ने अंकिता के शोकाकुल माता-पिता से मुलाकात की। उस भावुक मुलाकात में मुख्यमंत्री ने वादा किया था कि सरकार पीड़ित परिवार की इच्छा के अनुरूप ही कदम उठाएगी। अंततः (State Government Recommendation) पर मुहर लगाते हुए सीबीआई जांच की मांग को स्वीकार कर लिया गया। अब उम्मीद की जा रही है कि जांच का यह नया आयाम उन कड़ियों को जोड़ेगा जो अब तक बिखरी हुई थीं, ताकि अंकिता के हत्यारों को उनके किए की कड़ी सजा दिलाई जा सके।
विपक्ष का तीखा प्रहार और अधूरे सवालों की गूंज
भले ही सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में दांव-पेंच अभी खत्म नहीं हुए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने सरकार के इस कदम को नाकाफी बताते हुए कड़े सवाल दागे हैं। उनका मुख्य प्रहार उस ‘वीआईपी’ चेहरे पर है जिसकी चर्चा इस केस की शुरुआत से ही (Investigation Transparency Issues) के साये में बनी हुई है। विपक्ष अब भी यह पूछ रहा है कि उस रात रिजॉर्ट पर बुलडोजर चलाने का आदेश किसका था, क्योंकि उसी कार्रवाई ने सबूतों को नष्ट करने का काम किया था।
11 जनवरी का आह्वान और जनता की जीत का दावा
उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार के इस फैसले को जनता की जीत बताया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सीबीआई जांच की मंजूरी देना इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती दौर में (Law Enforcement Shortcomings) के कारण जांच में भारी खामियां रही थीं। कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने पहले ही 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का आह्वान किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि वे इस मामले को महज एक सरकारी आदेश तक सीमित नहीं रहने देना चाहते।
बीजेपी का बचाव और संवेदनशीलता का तर्क
सत्ता पक्ष की ओर से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मुख्यमंत्री के फैसले का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री धामी को एक संवेदनशील नेता बताते हुए कहा कि उन्होंने अंकिता के माता-पिता को दिया गया वचन निभाया है। भट्ट ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे (Judicial Process Integrity) का सम्मान करें और इस मामले को अब सीबीआई के विवेक पर छोड़ दें। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरोपियों को पहले ही सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है, इसलिए बार-बार राजनीति करना उचित नहीं है।
‘वीआईपी’ शब्द पर छिड़ी नई जंग
बीजेपी अध्यक्ष ने विपक्ष से आग्रह किया है कि ‘वीआईपी’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल करके दिवंगत अंकिता की आत्मा को आहत न किया जाए। हालांकि, जनता के बीच यह सवाल अब भी कौंध रहा है कि अगर कोई वीआईपी था ही नहीं, तो उस पर चर्चा इतनी गहरी क्यों है? (Public Interest Litigation) और अदालती कार्यवाहियों के बीच ‘वीआईपी’ का जिक्र बार-बार इस केस की गंभीरता को बढ़ा देता है। सत्ता पक्ष इसे महज एक अफवाह करार दे रहा है, जबकि प्रदर्शनकारियों के लिए यह न्याय की सबसे बड़ी बाधा है।
हाईकोर्ट के आदेश और मुख्यमंत्री का बयान
साल 2025 के अंत में यह मामला तब और उलझ गया जब एक रसूखदार नेता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया ताकि मीडिया और सोशल मीडिया से उनका नाम हटाया जा सके। इसी बीच (Official Government Statements) के माध्यम से मुख्यमंत्री धामी का वह बयान भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा था कि वारदात के वक्त संबंधित नेता उत्तराखंड में मौजूद ही नहीं था। इस बयान ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को और मसाला दे दिया, जिससे मामला सुलझने के बजाय और पेचीदा हो गया।
सीबीआई के सामने खड़ा चुनौतियों का पहाड़
अब जब मामला केंद्रीय एजेंसी के पास है, तो सबसे बड़ी चुनौती उन सबूतों को तलाशने की होगी जो रिजॉर्ट के ध्वस्तीकरण के दौरान कथित तौर पर मिटा दिए गए थे। अंकिता के परिजन और उत्तराखंड की जनता (Criminal Justice System) से केवल एक ही उम्मीद लगाए बैठी है कि अब कम से कम सच सामने आएगा। क्या सीबीआई उन परदों को उठा पाएगी जिन्हें अब तक रसूख की ओट में छिपाया गया है, या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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