ElderCare – बुजुर्गों की देखभाल में बेटियां निभा रहीं सबसे बड़ी जिम्मेदारी
ElderCare – समाज में लंबे समय से यह धारणा प्रचलित रही है कि बुजुर्ग माता-पिता का सबसे बड़ा सहारा बेटे होते हैं, लेकिन लखनऊ के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में सामने आ रहे अनुभव एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) और बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि मानसिक और वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से जूझ रहे अधिकांश बुजुर्ग मरीजों के साथ देखभाल के लिए उनकी बेटियां अधिक संख्या में पहुंच रही हैं। इलाज से लेकर नियमित देखरेख तक, कई मामलों में बेटियां ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाती दिखाई दे रही हैं।

चिकित्सकों ने साझा किए अनुभव
बलरामपुर अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. देवाशीष शुक्ला के अनुसार, उनके विभाग में आने वाले लगभग 70 प्रतिशत बुजुर्ग मरीजों को उपचार के लिए उनकी बेटियां लेकर आती हैं। उनका कहना है कि मानसिक रूप से अस्वस्थ माता-पिता की देखभाल में बेटियां धैर्य और संवेदनशीलता के साथ लगातार सहयोग करती हैं। दवा देने, चिकित्सकों से उपचार संबंधी जानकारी लेने, जांच की प्रक्रिया पूरी कराने और अस्पताल में हर समय साथ रहने जैसी जिम्मेदारियां वे सक्रिय रूप से निभाती हैं।
विवाह के बाद भी निभा रहीं पारिवारिक जिम्मेदारी
अस्पतालों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां विवाहित बेटियां अपने मायके के बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए लगातार अस्पताल में मौजूद रहती हैं। चिकित्सकों के अनुसार, कई महिलाएं अपने पारिवारिक दायित्वों के साथ माता-पिता की सेवा भी समान समर्पण से कर रही हैं। कई मामलों में वे कई दिनों तक अस्पताल में रुककर इलाज की पूरी प्रक्रिया पर नजर रखती हैं, ताकि मरीज को किसी तरह की परेशानी न हो।
केजीएमयू में भी दिखा समान रुझान
केजीएमयू के वृद्धावस्था मानसिक रोग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विद्या केएल के अनुसार, विभाग में आने वाले 50 प्रतिशत से अधिक मरीजों के साथ महिला तीमारदार मौजूद रहती हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से आने वाले मरीजों में यह प्रवृत्ति समान रूप से दिखाई देती है। खास तौर पर बेटियां अपने माता-पिता के इलाज, नियमित जांच और फॉलोअप के दौरान अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
मरीजों के अनुभव भी बदल रहे सोच
अस्पताल में भर्ती कुछ बुजुर्ग मरीजों ने भी अपने अनुभव साझा किए। एक बुजुर्ग मरीज ने बताया कि उनके बेटे रोजगार और परिवार के कारण अलग शहरों में रहने लगे, जबकि बीमारी के समय उनकी विवाहित बेटी लगातार उनके साथ रही। उन्होंने कहा कि कठिन समय में मिली इस देखभाल ने उनके पारिवारिक संबंधों को लेकर बनी पुरानी सोच को बदल दिया। हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं और देखभाल का स्वरूप भी उसी के अनुसार बदल सकता है।
बदलते सामाजिक परिदृश्य की झलक
चिकित्सकों का मानना है कि अस्पतालों में दिखाई दे रहे ऐसे उदाहरण समाज में बदलते पारिवारिक संबंधों की ओर संकेत करते हैं। बेटियां अब केवल भावनात्मक सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि माता-पिता की चिकित्सा, देखभाल और नियमित उपचार की जिम्मेदारियां भी सक्रिय रूप से निभा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुजुर्गों की देखभाल में परिवार के सभी सदस्यों की भागीदारी महत्वपूर्ण है और ऐसे सकारात्मक उदाहरण समाज में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का संदेश देते हैं।