उत्तर प्रदेश

Education – मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने हिंदी पाठ्यक्रम में किए महत्वपूर्ण बदलाव

Education – उत्तर प्रदेश के बलरामपुर स्थित मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए हनुमान चालीसा और सुंदरकांड को शामिल करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, यह संशोधित पाठ्यक्रम नए शैक्षणिक सत्र से लागू किया जाएगा। इस बदलाव का प्रभाव देवीपाटन मंडल से संबद्ध 174 महाविद्यालयों के विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जहां स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर हिंदी का अध्ययन कराया जाता है।

नए पाठ्यक्रम में शामिल की गईं प्रमुख रचनाएं

विश्वविद्यालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, बीए प्रथम वर्ष के हिंदी पाठ्यक्रम में अयोध्याकांड के चयनित दोहे और रामलला नहछू को स्थान दिया गया है। वहीं, पहली बार हनुमान चालीसा को भी स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। एमए प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के लिए सुंदरकांड को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। विश्वविद्यालय का कहना है कि इन रचनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य, काव्य परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलेगा।

स्थानीय साहित्यिक परंपरा पर भी दिया गया जोर

विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह भी दावा किया है कि हनुमान चालीसा की एक परंपरा बलरामपुर जिले के तुलसीपुर क्षेत्र से जुड़े संत तुलसीदास से भी संबंधित मानी जाती है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालय ने कुछ प्रकाशित साहित्य और शोध सामग्री का उल्लेख किया है। हालांकि, इस विषय पर अलग-अलग विद्वानों के बीच विभिन्न मत मौजूद हैं और इसे लेकर अकादमिक स्तर पर विमर्श जारी है।

कुलपति ने बताई बदलाव की मंशा

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रविशंकर सिंह ने कहा कि पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। उनके अनुसार, शिक्षा तभी अधिक सार्थक बनती है जब उसमें स्थानीय परंपराओं और साहित्यिक धरोहर को भी उचित स्थान मिले। उन्होंने बताया कि संशोधित पाठ्यक्रम को पूर्व में स्वीकृति मिल चुकी थी और अब इसे नए सत्र से लागू किया जाएगा।

शिक्षाविदों ने निर्णय का किया समर्थन

विश्वविद्यालय वित्त समिति के सदस्य सर्वेश सिंह ने कहा कि इस पहल से विद्यार्थियों को भारतीय साहित्यिक परंपरा को समझने का बेहतर अवसर मिलेगा। वहीं, हिंदी विभाग से जुड़े शिक्षाविदों का मानना है कि पाठ्यक्रम में लोकभाषा, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक साहित्य को शामिल करने से अध्ययन अधिक व्यापक और उपयोगी बनेगा। उनका कहना है कि आधुनिक शिक्षा में साहित्यिक विविधता और सांस्कृतिक संदर्भों का समावेश विद्यार्थियों के समग्र विकास में सहायक हो सकता है।

विश्वविद्यालय के इस फैसले की शिक्षा जगत में चर्चा हो रही है। समर्थक इसे भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन को बढ़ावा देने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि इस विषय पर व्यापक अकादमिक विमर्श भी जारी है। नए पाठ्यक्रम के लागू होने के बाद इसके प्रभाव का आकलन आने वाले समय में किया जाएगा।

Back to top button

Adblock Detected

Please disable your AdBlocker first, and then you can watch everything easily.