Allahabad High Court CCTV Storage Ruling: खाकी की चालाकी पर चला हाईकोर्ट का हथौड़ा, क्या सीसीटीवी के सबूत मिटाकर गुनहगारों को बचा रहा है सिस्टम…
Allahabad High Court CCTV Storage Ruling: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया यानी डीजीपी द्वारा जारी किए गए एक हालिया परिपत्र पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उस नियम पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं जिसमें राज्य के सभी पुलिस थानों की (Digital Surveillance Footage) को केवल दो से ढाई महीने तक ही सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबिता रानी की खंडपीठ ने इस आदेश को न केवल अजीब बताया, बल्कि इसे न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने वाला कदम करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की खुली अवमानना
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि डीजीपी का यह सर्कुलर सुप्रीम कोर्ट के ‘परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह’ मामले में दिए गए फैसले का प्रथमदृष्टया उल्लंघन नजर आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि थानों में (Police Station Monitoring) के लिए लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग कम से कम 6 से 18 महीने तक संरक्षित रहनी चाहिए। हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि जब देश की सबसे बड़ी अदालत का स्पष्ट आदेश मौजूद है, तो राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारी ने उसके विपरीत जाकर डेटा डिलीट करने का नियम कैसे बना दिया।
मुख्य सचिव को तलब करने की चेतावनी और कड़े सवाल
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या (Criminal Procedure Rules) के तहत बीएनएसएस की धारा 179(2) के आवश्यक नियम बनाए गए हैं या नहीं। अदालत ने दोटूक कहा है कि यदि निर्धारित समय के भीतर संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर खुद कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा।
उन्नाव पुलिस पर महिला को अवैध हिरासत में रखने का आरोप
यह पूरी कानूनी लड़ाई उन्नाव की निवासी रूबी सिंह की याचिका से शुरू हुई, जिन्होंने पुलिस पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। याचिका के अनुसार, पुलिस ने उनके रिश्तेदारों पर दर्ज एक मुकदमे के नाम पर उन्हें अवैध रूप से उठाया और उनके साथ मारपीट की। (Human Rights Protection) का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि 7 अगस्त की रात एक महिला को बिना किसी महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी के लॉकअप में रखा गया और उन पर अश्लील टिप्पणियां भी की गईं।
रिश्वतखोरी और अवैध गिरफ्तारी का सनसनीखेज मामला
याचिकाकर्ताओं ने पुलिसिया तंत्र के भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए दावा किया कि उनके परिवार के दो अन्य सदस्यों को 10,000 रुपये की रिश्वत लेने के बाद ही रिहा किया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस ने इस पूरी (Illegal Police Custody) के दौरान कोई गिरफ्तारी मेमो या आधिकारिक कागजी कार्रवाई नहीं की थी। जब मामला कोर्ट पहुंचा और सीसीटीवी फुटेज मांगी गई, तो पुलिस ने तकनीकी खामियों और डीजीपी के पुराने सर्कुलर का बहाना बनाकर सबूत पेश करने से इनकार कर दिया।
एसपी उन्नाव के हलफनामे से खुली सिस्टम की पोल
जब हाईकोर्ट ने उन्नाव के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था, तब उन्होंने हलफनामा दाखिल कर बताया कि रिकॉर्डिंग उपलब्ध ही नहीं है। एसपी ने तर्क दिया कि जून 2025 के डीजीपी सर्कुलर के अनुसार स्टोरेज क्षमता कम होने के कारण पुरानी फाइलें अपने आप डिलीट हो जाती हैं। अदालत ने इस दलील को (Contempt of Court) का आधार मानते हुए कहा कि राज्यों को अपनी तकनीकी क्षमता सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार विकसित करनी ही होगी, वह बजट या स्टोरेज का बहाना नहीं बना सकते।
न्याय की उम्मीद और 29 जनवरी की तारीख
अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2026 के लिए तय की है, जहाँ शासन को अपनी स्थिति साफ करनी होगी। हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख उन अधिकारियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो तकनीकी दांव-पेच का सहारा लेकर (Law Enforcement Accountability) से बचने की कोशिश करते हैं। यह मामला तय करेगा कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के थानों में सीसीटीवी फुटेज का संरक्षण किस प्रकार होगा ताकि किसी भी बेगुनाह के साथ पुलिस की चारदीवारी के भीतर नाइंसाफी न हो सके।



