VoterList – बंगाल में 60 लाख नामों पर जागा विभाग का संशय
VoterList – पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर असामान्य स्थिति बन गई है। शनिवार को अंतिम सूची जारी होनी है, लेकिन करीब 60 लाख से अधिक नामों पर अब भी निर्णय बाकी है। यह संख्या कुल मतदाताओं का लगभग साढ़े आठ प्रतिशत बताई जा रही है। खास बात यह है कि इन नामों की समीक्षा अब सामान्य निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के बजाय सुप्रीम कोर्ट द्वारा नामित न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं। इस प्रक्रिया ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है।

समीक्षा प्रक्रिया में अचानक बढ़ी संख्या
निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक जांच के बाद बड़ी संख्या में आवेदनों को मंजूरी दे दी थी। बाद में आयोग की ओर से तैनात सूक्ष्म-प्रेक्षकों ने कई मामलों में विसंगतियां बताईं, जिसके चलते पहले से स्वीकृत नामों को फिर से समीक्षा के दायरे में डाल दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक 11 फरवरी के बाद लंबित मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी और सुनवाई की अंतिम तिथि 14 फरवरी तक यह आंकड़ा 60 लाख से अधिक पहुंच गया। कुछ मामलों में पहले स्वीकृत नामों को भी पुनर्विचार के लिए वापस भेजा गया।
अल्पसंख्यक बहुल जिलों में अधिक प्रभाव
उपलब्ध आंकड़ों से संकेत मिलता है कि जिन जिलों में अल्पसंख्यक आबादी अधिक है, वहां लंबित मामलों की संख्या भी ज्यादा है। मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में लाखों नाम जांच के अधीन हैं। झारग्राम और कालिम्पोंग जैसे छोटे जिलों में भी हजारों मामले लंबित बताए जा रहे हैं। इस स्थिति ने स्थानीय स्तर पर मतदाताओं में अनिश्चितता की भावना बढ़ा दी है।
न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पश्चिम बंगाल के अलावा ओडिशा और झारखंड के कुल 530 न्यायिक अधिकारी इस सप्ताह से इन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। जब तक संबंधित अधिकारी किसी नाम को मंजूरी नहीं देते, तब तक वह मतदाता सूची में ‘निर्णय के अधीन’ दर्ज रहेगा। इसका अर्थ है कि अंतिम स्वीकृति मिलने तक संबंधित व्यक्ति आगामी चुनाव में मतदान नहीं कर सकेगा।
सूक्ष्म-प्रेक्षकों की भूमिका पर विवाद
निर्वाचन आयोग ने राज्य में करीब 8,100 सूक्ष्म-प्रेक्षकों की नियुक्ति की थी। इस कदम को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने आरोप लगाया है कि इन प्रेक्षकों ने वैधानिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में दखल दिया है। वहीं आयोग के अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेजों में कई अनियमितताएं सामने आईं, जिनकी वजह से अतिरिक्त जांच आवश्यक हो गई। कुछ मामलों में संदिग्ध दस्तावेज और गलत प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए जाने की बात भी सामने आई है।
प्रशासनिक चुनौती और आगे का रास्ता
राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्थिति को जटिल और अभूतपूर्व बताया है। उनका कहना है कि न्यायिक निगरानी में इतनी बड़ी संख्या में नामों की समीक्षा अपने आप में अलग तरह की प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर लंबित नाम प्रशासनिक तैयारी और सत्यापन तंत्र की मजबूती पर सवाल खड़े करते हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि हर पात्र मतदाता को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत अधिकार मिले।
अब सबकी नजर इस पर है कि न्यायिक अधिकारी कितनी जल्दी इन मामलों का निपटारा करते हैं और अंतिम सूची में कितने नाम शामिल हो पाते हैं। चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्पष्टता और समयबद्ध निर्णय अहम होंगे।



