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SupremeCourtVerdict – वंदे मातरम विवाद पर याचिका सुनने से अदालत का इनकार

SupremeCourtVerdict – सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को अनिवार्य बनाने से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक सर्कुलर के खिलाफ दायर की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित निर्देश को अनिवार्य रूप में नहीं देखा जा सकता और इसमें किसी प्रकार की बाध्यता का प्रावधान नहीं है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।

याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना गया
पीठ ने मुहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर इस याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं माना। अदालत का कहना था कि याचिका में जो आशंकाएं व्यक्त की गई हैं, वे स्पष्ट और ठोस आधार पर नहीं टिकी हैं। न्यायाधीशों ने संकेत दिया कि केवल संभावित आशंकाओं के आधार पर किसी निर्देश को चुनौती नहीं दी जा सकती, जब तक कि उससे संबंधित कोई प्रत्यक्ष प्रभाव या नुकसान सामने न आए।

दलीलों में उठाया गया धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने तर्क रखा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत आस्था के खिलाफ जाकर राष्ट्रीय गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने इसे सामाजिक दबाव का एक रूप बताते हुए कहा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। उनके अनुसार, देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए ऐसे मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

न्यायालय ने सर्कुलर की भाषा पर दी स्पष्टता
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सर्कुलर की भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें ‘मई’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो अनिवार्यता को नहीं बल्कि विकल्प को दर्शाता है। इसका मतलब यह है कि वंदे मातरम गाना किसी के लिए बाध्यकारी नहीं है। अदालत ने कहा कि इस तरह का निर्देश किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता।

दंडात्मक प्रावधानों पर पूछे गए सवाल
पीठ ने यह भी जानने की कोशिश की कि क्या सर्कुलर में वंदे मातरम न गाने पर किसी तरह की सजा का प्रावधान है या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या किसी व्यक्ति को इस आधार पर कोई कार्रवाई झेलनी पड़ी है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि व्यवधान उत्पन्न करने की स्थिति में कुछ प्रावधान हैं, लेकिन सीधे तौर पर न गाने पर दंड का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

भविष्य में याचिका दाखिल करने का विकल्प खुला
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई होती है या कोई नोटिस जारी किया जाता है, तो वह दोबारा अदालत का रुख कर सकता है। फिलहाल, अदालत ने इस याचिका को केवल आशंका पर आधारित मानते हुए खारिज कर दिया। इस फैसले से यह साफ हो गया कि बिना ठोस आधार के केवल संभावित विवादों पर न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहेगा।

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