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Parliament – लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज से संभावित चर्चा

Parliament – संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार से शुरू हो रहा है और इसकी शुरुआत लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की संभावना के साथ हो सकती है। विपक्षी दलों ने बजट सत्र के पहले चरण के दौरान ही इस संबंध में नोटिस दिया था, जिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। शुरुआत में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, लेकिन अब पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह विपक्ष की इस पहल का समर्थन करेगी। ऐसे में सदन के भीतर इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

अविश्वास प्रस्ताव लाने की संसदीय प्रक्रिया

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए संसद में निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी होता है। नियमों के मुताबिक कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर के साथ 14 दिन पहले नोटिस दिया जाना चाहिए। इसके बाद प्रस्ताव को सदन में चर्चा के लिए सूचीबद्ध करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। इस मामले में कांग्रेस के सांसद मोहम्मद जावेद, कोडिकुनिल सुरेश और मल्लू रवि ने प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यदि प्रक्रिया पूरी होने के बाद नोटिस स्वीकार किया जाता है, तो सदन में इस पर औपचारिक चर्चा कराई जाती है।

नोटिस में लगाए गए प्रमुख आरोप

विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस में लोकसभा की कार्यवाही को लेकर कई आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। विपक्ष का आरोप है कि सदन में नेता प्रतिपक्ष और अन्य विपक्षी नेताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा बजट सत्र के दौरान आठ विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि कुछ महिला सांसदों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को विपक्ष बेबुनियाद मानता है और इसे लेकर भी असंतोष जताया गया है।

नोटिस स्वीकार होने पर आगे की प्रक्रिया

यदि अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो इसके बाद सदन में चर्चा के लिए समय निर्धारित किया जाता है। संसदीय परंपरा के अनुसार, ऐसे मामलों में लोकसभा अध्यक्ष स्वयं सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करते। सामान्य परिस्थितियों में यह जिम्मेदारी उपाध्यक्ष निभाते हैं, लेकिन फिलहाल लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद खाली है। ऐसी स्थिति में सभापति पैनल में शामिल वरिष्ठ सदस्य कार्यवाही का संचालन करते हैं। संसदीय सूत्रों के अनुसार, यदि चर्चा होती है तो यह जिम्मेदारी वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल को सौंपी जा सकती है।

संख्या बल को लेकर विपक्ष के सामने चुनौती

इस प्रस्ताव के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सदन के संख्या गणित से जुड़ा हुआ है। लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कम से कम 272 सांसदों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा स्थिति में सत्तारूढ़ पक्ष के पास लगभग 293 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है, जिसमें बीजेपी, जेडीयू, टीडीपी और एनडीए के अन्य सहयोगी दल शामिल हैं। दूसरी ओर विपक्षी दलों की कुल संख्या करीब 238 के आसपास मानी जा रही है। ऐसे में यदि प्रस्ताव पर मतदान की स्थिति बनती है तो उसके पारित होने की संभावना सीमित दिखाई देती है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहस के दौरान विपक्ष इस मुद्दे के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है।

संसदीय इतिहास में पहले भी आए ऐसे प्रस्ताव

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का इतिहास नया नहीं है। संसद के इतिहास में कई बार इस तरह के प्रस्ताव पेश किए जा चुके हैं। वर्ष 1954 में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया था। उस समय विपक्ष के नेता जे.बी. कृपलानी थे और प्रस्ताव विग्नेश्वर मिश्रा द्वारा पेश किया गया था, लेकिन इसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया।

इसके बाद 1966 में मधु लिमये ने लोकसभा अध्यक्ष हुकुम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, हालांकि आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया। वर्ष 1987 में सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन वह भी पारित नहीं हो सका। हाल के वर्षों में दिसंबर 2024 में विपक्ष ने राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था, जिस पर लगभग 60 सांसदों के हस्ताक्षर थे, लेकिन उस प्रस्ताव को उपसभापति हरिवंश ने स्वीकार नहीं किया था।

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