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MaternityLeave – तीसरी गर्भावस्था पर भी समान अवकाश का हाईकोर्ट आदेश

MaternityLeave – महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश को लेकर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है, चाहे वह पहली, दूसरी या तीसरी गर्भावस्था ही क्यों न हो। अदालत ने कहा कि हर गर्भावस्था में महिला को समान शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इसलिए सभी मामलों में समान मातृत्व लाभ दिया जाना चाहिए। इस फैसले को कार्यस्थल पर लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सरकारी आदेश पर उठाए सवाल

न्यायमूर्ति आर. सुरेश कुमार और न्यायमूर्ति एन. सेंथिल कुमार की खंडपीठ ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को अनुचित बताया, जिसमें तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह तक सीमित कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि यह आदेश महिलाओं के साथ असमान व्यवहार को बढ़ावा देता है और इसे उचित ठहराने के लिए कोई ठोस आधार भी प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, ऐसी सीमाएं न केवल अव्यावहारिक हैं बल्कि संविधान में निहित समानता के सिद्धांत के भी विपरीत हैं।

याचिका पर सुनाया गया फैसला

यह निर्णय शाइयी निशा नामक महिला कर्मचारी की याचिका पर आया, जिन्होंने लंबी अवधि के मातृत्व अवकाश की मांग की थी। इससे पहले उनकी मांग को निचली अदालतों द्वारा खारिज कर दिया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन आदेशों को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर उनका आवेदन स्वीकार किया जाए। अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि मातृत्व से जुड़ी जरूरतें हर गर्भावस्था में समान होती हैं और उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटना तर्कसंगत नहीं है।

समानता के सिद्धांत पर जोर

खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि किसी महिला के लिए तीसरी गर्भावस्था भी उतनी ही संवेदनशील होती है जितनी पहली या दूसरी। ऐसे में यह मान लेना कि तीसरी बार मातृत्व अवकाश की जरूरत कम हो जाती है, पूरी तरह गलत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक आवश्यक अधिकार है, जो महिला और नवजात दोनों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।

पूर्व न्यायिक फैसलों का हवाला

अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में यह स्थापित किया गया है कि मातृत्व लाभ को सीमित करना या उसमें भेदभाव करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि कार्यपालिका को ऐसे आदेश जारी करते समय न्यायिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और किसी भी तरह का निर्णय कानून की स्थापित व्याख्या के विपरीत नहीं होना चाहिए।

कल्याणकारी राज्य की भूमिका पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि तमिलनाडु सरकार खुद को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में प्रस्तुत करती है और महिलाओं के हित में कई योजनाएं लागू करती रही है। ऐसे में मातृत्व अवकाश को सीमित करना उसकी नीतियों के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा जारी कोई भी आदेश न्यायालय के स्थापित सिद्धांतों से ऊपर नहीं हो सकता। इसलिए तीसरी गर्भावस्था के लिए अवकाश को सीमित करना न केवल अनुचित है बल्कि इसे जारी रखना भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

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