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Maharashtra Political Crisis: महायुति में छिड़ा महासंग्राम, रामदास अठावले ने किया बड़ा ऐलान

Maharashtra Political Crisis: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। महायुति गठबंधन के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब सड़कों पर आ गई है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के अध्यक्ष रामदास अठावले ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने बीएमसी चुनाव में अपनी पार्टी को उचित स्थान न दिए जाने को (Political Betrayal in Maharashtra) करार दिया है। अठावले का यह कड़ा रुख आगामी नगर निगम चुनावों के समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है।

Maharashtra Political Crisis
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कार्यकर्ताओं की नाराजगी और सात सीटों का अपमानजनक प्रस्ताव

रामदास अठावले ने आरोप लगाया कि गठबंधन के प्रमुख दलों ने आरपीआई (ए) की निष्ठा का मजाक उड़ाया है। उन्होंने खुलासा किया कि गठबंधन की ओर से उन्हें महज सात सीटों का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया। अठावले के अनुसार, देर रात इस तरह का (Unfair Seat Distribution) प्रस्ताव देना न केवल अव्यावहारिक था, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं का अपमान भी था जो वर्षों से गठबंधन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।

वंचित बहुजन अघाड़ी बनाम आरपीआई (ए) की ताकत का दावा

मुंबई की जमीनी हकीकत को बयां करते हुए अठावले ने कहा कि उनकी पार्टी का जनाधार वंचित बहुजन अघाड़ी से कहीं ज्यादा बड़ा और मजबूत है। इसके बावजूद सीट बंटवारे के दौरान उन्हें दरकिनार करना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि (Republican Party of India Strength) को नजरअंदाज करना महायुति के लिए भारी पड़ सकता है। अठावले ने साफ कर दिया कि वे उन नेताओं में से नहीं हैं जो सत्ता के लालच में बार-बार अपनी बात और रुख बदल लें।

38 सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ का चौंकाने वाला फैसला

गठबंधन में उपेक्षा का शिकार होने के बाद अठावले ने एक बड़ा चुनावी दांव चला है। उन्होंने घोषणा की है कि आरपीआई (ए) मुंबई की 38 सीटों पर अपने स्वतंत्र उम्मीदवार उतारेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि बाकी सीटों पर वे भाजपा और शिवसेना का समर्थन करते रहेंगे। इस (Friendly Contest in BMC) के जरिए अठावले अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान और ताकत को साबित करना चाहते हैं, ताकि भविष्य में कोई उन्हें हल्के में न ले।

सत्ता में भागीदारी और अंबेडकरवादी समाज का मान

रामदास अठावले का मानना है कि अंबेडकरवादी समाज की सत्ता में सक्रिय भागीदारी के बिना दलितों और वंचितों का कल्याण संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं की गरिमा के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, अगर (Dalit Leadership in Politics) को दबाने की कोशिश की गई, तो पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अठावले ने उम्मीदवारों की सूची जारी करते हुए कार्यकर्ताओं से चुनावी मैदान में डट जाने का आह्वान किया।

महायुति के भीतर बढ़ती दूरियां और एनसीपी का रुख

मुंबई महानगरपालिका के चुनावों में केवल अठावले ही नाराज नहीं हैं, बल्कि उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अगुवाई वाली एनसीपी ने भी अपनी राह अलग कर ली है। एनसीपी पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह बीएमसी चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। इस तरह (Split in Mahayuti Alliance) अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है। गठबंधन की तीन बड़ी शाखाएं अब अलग-अलग दिशाओं में काम कर रही हैं, जिसका सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है।

नामांकन की अंतिम घड़ी और चुनावी सरगर्मी

महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों के लिए 15 जनवरी को मतदान होना है, जिसके लिए नामांकन प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। मंगलवार को नामांकन की आखिरी तारीख होने के कारण (Maharashtra Local Body Elections) का माहौल बेहद तनावपूर्ण और रोमांचक हो गया है। महायुति के भीतर मची यह खींचतान गठबंधन की एकता पर सवालिया निशान लगा रही है। अब देखना यह है कि क्या भाजपा और शिवसेना अंतिम समय में अठावले को मनाने में कामयाब होते हैं या नहीं।

बीएमसी चुनाव का भविष्य और बदलता जनादेश

मुंबई की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही महायुति के लिए यह आंतरिक कलह एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। अठावले के अलग चुनाव लड़ने से (Mumbai Municipal Corporation Polls) के नतीजों पर गहरा असर पड़ सकता है। यदि आरपीआई के उम्मीदवार निर्णायक वोट काटते हैं, तो इसका सीधा असर भाजपा और शिवसेना की जीत के अंतर पर पड़ेगा। महाराष्ट्र की जनता अब यह देख रही है कि विकास के नाम पर बना यह गठबंधन व्यक्तिगत हितों और सीटों की लड़ाई में कितना टिक पाता है

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