Agriculture – अब भी चिंता का विषय बनी हैं किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याएं
Agriculture – देश में कृषि क्षेत्र से जुड़ी परेशानियां अब भी गंभीर बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों और खेतिहर मजदूरों के बीच आत्महत्या के मामलों में मामूली कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंता पैदा करने वाली है। आंकड़ों के मुताबिक बीते वर्ष कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह संख्या 2023 के मुकाबले थोड़ी कम है, लेकिन औसतन हर दिन करीब 28 लोगों का जीवन खत्म होना ग्रामीण संकट की गहराई को दिखाता है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याएं देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत हिस्सा रहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि खेती से आय में गिरावट, बढ़ता कर्ज और रोजगार की अस्थिरता ग्रामीण परिवारों पर लगातार दबाव बढ़ा रही है।
खेतिहर मजदूरों की बढ़ती हिस्सेदारी ने बढ़ाई चिंता
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वालों में खेतिहर मजदूरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 में कुल 10,546 मामलों में से 5,913 खेतिहर मजदूर थे। यानी कुल मामलों में उनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में खेती से होने वाली आमदनी कम होने के कारण बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी पर निर्भर हो गए हैं। अस्थायी काम, कम मजदूरी और आर्थिक असुरक्षा ने हालात को और कठिन बना दिया है। वर्ष 2020 में खेतिहर मजदूरों की हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत थी, जो अब लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है।
2022 में सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए थे
रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022 में कृषि क्षेत्र में आत्महत्या के मामलों ने सबसे ऊंचा स्तर छुआ था। उस समय 11,290 मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद दो वर्षों में आंकड़ों में थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े जानकारों का कहना है कि केवल आंकड़ों में कमी आना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। किसानों की आय, सिंचाई, फसल बीमा और बाजार व्यवस्था जैसे मुद्दों पर दीर्घकालिक सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में सबसे अधिक मामले
राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3,824 मामले दर्ज किए गए। यह देश में कृषि क्षेत्र से जुड़ी कुल आत्महत्याओं का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा है। कर्नाटक दूसरे स्थान पर रहा, जहां 2,971 मामले सामने आए।
इसके अलावा मध्य प्रदेश में 835, आंध्र प्रदेश में 780, तमिलनाडु में 503 और छत्तीसगढ़ में 486 मामले दर्ज किए गए। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े कृषि राज्यों में यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग राज्यों में रिपोर्टिंग व्यवस्था और सामाजिक कारणों का भी आंकड़ों पर असर पड़ सकता है।
कुछ राज्यों में बढ़े मामले, कुछ में राहत
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में कर्नाटक में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई। यहां पिछले साल की तुलना में मामलों में 22.61 प्रतिशत की वृद्धि हुई। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी आत्महत्या के मामलों में इजाफा देखा गया।
वहीं आंध्र प्रदेश में कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं में कमी दर्ज की गई है। पुदुचेरी में स्थिति अलग रही, जहां पिछले कुछ वर्षों तक कोई मामला सामने नहीं आया था, लेकिन 2024 में यह संख्या बढ़कर 33 तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि संकट केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में सरकारों और संस्थाओं के लिए राहत योजनाओं के साथ मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर भी ध्यान देना जरूरी माना जा रहा है।