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BabyCare – जानें नवजात शिशु को शहद देने की परंपरा पर डॉक्टरों की सलाह

BabyCare – भारत में नवजात शिशुओं की देखभाल से जुड़ी कई पारंपरिक मान्यताएं आज भी परिवारों में प्रचलित हैं। इनमें जन्म के बाद बच्चे को शहद चटाने की रस्म भी शामिल है। कई लोग इसे शुभ मानते हैं और विश्वास करते हैं कि इससे बच्चे का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात शिशु को शहद देना सुरक्षित नहीं माना जाता और इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से डॉक्टर माता-पिता को इस विषय में सतर्क रहने की सलाह देते हैं।

शिशु के लिए क्यों उपयुक्त नहीं माना जाता शहद

बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शहद नहीं दिया जाना चाहिए। जन्म के शुरुआती महीनों में शिशु का पाचन तंत्र और रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। ऐसे में कुछ खाद्य पदार्थों में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं से उसका शरीर प्रभावी ढंग से मुकाबला नहीं कर पाता। यही कारण है कि शहद को नवजात और छोटे बच्चों के लिए जोखिमपूर्ण माना जाता है।

इन्फेंट बोटुलिज्म का रहता है खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि शहद में क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम नामक जीवाणु के सूक्ष्म स्पोर्स मौजूद हो सकते हैं। वयस्कों के लिए ये आमतौर पर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन छोटे बच्चों में गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। यदि ये स्पोर्स शिशु की आंतों में सक्रिय हो जाएं तो विषैले तत्व बनने लगते हैं, जिससे इन्फेंट बोटुलिज्म नामक दुर्लभ लेकिन खतरनाक स्थिति विकसित हो सकती है। यह समस्या बच्चे के स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है।

सांस और तंत्रिका तंत्र पर पड़ सकता है प्रभाव

इन्फेंट बोटुलिज्म होने पर बच्चे की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसका असर शरीर के उन हिस्सों पर भी पड़ सकता है जो सांस लेने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी स्थिति में शिशु को सांस लेने में कठिनाई, कमजोर रोना, अत्यधिक सुस्ती, दूध निगलने में परेशानी और सामान्य गतिविधियों में कमी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

पाचन संबंधी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं

नवजात शिशु का पाचन तंत्र जन्म के बाद धीरे-धीरे विकसित होता है। इस कारण वह कई बाहरी खाद्य पदार्थों को आसानी से नहीं पचा पाता। शहद का सेवन कुछ मामलों में पेट संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है। बच्चों में कब्ज, पेट फूलना, उल्टी या पेट में असहजता जैसी शिकायतें देखने को मिल सकती हैं। चूंकि शुरुआती महीनों में शिशु का शरीर बेहद संवेदनशील होता है, इसलिए संक्रमण का जोखिम भी बढ़ जाता है।

जन्म के बाद शिशु के लिए क्या है सुरक्षित विकल्प

विशेषज्ञों के मुताबिक जन्म के तुरंत बाद मां का पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, नवजात के लिए बेहद लाभकारी होता है। इसमें ऐसे पोषक तत्व और प्रतिरक्षा घटक मौजूद होते हैं जो बच्चे को शुरुआती सुरक्षा प्रदान करते हैं। स्वास्थ्य संस्थानों की सलाह है कि जीवन के पहले छह महीनों तक शिशु को केवल स्तनपान कराया जाए। इसके बाद भी पूरक आहार शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी माना जाता है।

डॉक्टरों की सलाह को प्राथमिकता देने पर जोर

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक मान्यताओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन शिशु की सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक सलाह का पालन करना अधिक महत्वपूर्ण है। नवजात को शहद, घुट्टी, पानी या किसी अन्य बाहरी खाद्य पदार्थ देने से पहले विशेषज्ञ की राय लेना बेहतर माना जाता है। सही जानकारी और सावधानी से बच्चे के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।

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