झारखण्ड

TribalPolitics – सरना और सनातन मुद्दे पर बाबूलाल मरांडी ने दिया बयान

TribalPolitics – झारखंड में आदिवासी पहचान और धार्मिक परंपराओं को लेकर जारी राजनीतिक चर्चा के बीच भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस और झामुमो पर तीखा हमला बोला है। रांची स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि सरना, सनातन और हिंदू परंपराओं को अलग-अलग बताना समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश है। उनके अनुसार आदिवासी संस्कृति और प्रकृति पूजा की परंपरा भारतीय सांस्कृतिक धारा का ही हिस्सा रही है।

मरांडी ने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति की आराधना करता आया है। पेड़-पौधे, जल स्रोत, पहाड़ और धरती को पूजने की परंपरा आदिवासी जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने इसे सरना परंपरा की मूल भावना बताते हुए कहा कि यह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी हुई है।

आदिवासी समाज की विविधता पर दिया जोर

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि देशभर में आदिवासी समुदाय की अनेक जातियां और परंपराएं मौजूद हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा पद्धतियों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन उनकी साझा पहचान है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय उसे सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझने की जरूरत है। मरांडी के मुताबिक विविधता में एकता आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत रही है।

कांग्रेस और झामुमो पर लगाए आरोप

प्रेसवार्ता के दौरान बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस और झामुमो पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल आदिवासी समाज के बीच अलगाव की भावना पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

मरांडी ने कहा कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए जाने वाले आरोप तथ्यहीन हैं। उन्होंने दावा किया कि आदिवासी समुदाय की परंपराओं और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए भाजपा सरकारों ने लगातार काम किया है।

धर्मांतरण के मुद्दे पर भी बोले मरांडी

पूर्व मुख्यमंत्री ने धर्मांतरण के मुद्दे पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि समाज में धार्मिक परिवर्तन को लेकर चर्चा होती रही है, लेकिन आदिवासी परंपराओं को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। उनका कहना था कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना जरूरी है।

मरांडी ने यह भी कहा कि सरना, जाहेरथान और मांझीथान जैसे धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर पारंपरिक व्यवस्थाओं को प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं।

पेसा कानून और पारंपरिक व्यवस्था का उल्लेख

प्रेसवार्ता में बाबूलाल मरांडी ने पेसा कानून का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाओं का सम्मान होना चाहिए। स्थानीय संस्कृति और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए संवेदनशील नीति अपनाने की आवश्यकता है।

उन्होंने दावा किया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान आदिवासी धार्मिक स्थलों के संरक्षण की दिशा में कई कदम उठाए गए थे। जाहेरथान की घेराबंदी और संरक्षण से जुड़े कार्यों का भी उन्होंने उल्लेख किया।

राजनीतिक बहस के बीच बढ़ी चर्चा

झारखंड में सरना धर्म और आदिवासी पहचान का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है। विभिन्न दल इस विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। बाबूलाल मरांडी के ताजा बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दों पर बहस और तेज हो सकती है।

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