अंतर्राष्ट्रीय

USIranTalks – जिनेवा वार्ता बेनतीजा, तनाव बरकरार

USIranTalks – अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच जिनेवा में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने लंबी बातचीत की, लेकिन फिलहाल किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने की खबर नहीं है। कई घंटों तक चली इस अप्रत्यक्ष वार्ता के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसे गंभीर और चिंता से भरी चर्चा बताया। हालांकि उन्होंने बातचीत के ब्योरे सार्वजनिक नहीं किए। अमेरिकी पक्ष की ओर से भी तत्काल कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया और व्हाइट हाउस ने इस पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।

लंबी बैठक, लेकिन समझौता नहीं

जिनेवा में हुई बैठक को मौजूदा हालात में अहम माना जा रहा था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इस वार्ता से सकारात्मक संकेत की उम्मीद की जा रही थी। हालांकि, दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहने के कारण किसी समझौते की घोषणा नहीं हो सकी।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, चर्चा का दायरा मुख्य रूप से परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा रहा। अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन से बातचीत में कहा कि तेहरान ने अपना पक्ष स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है।

मध्यस्थ की भूमिका और अगला दौर

इन वार्ताओं में ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि बातचीत में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रगति हुई है, लेकिन उन्होंने भी विस्तृत जानकारी साझा नहीं की।

अब अगले चरण की बैठक वियना में प्रस्तावित है, जहां अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का मुख्यालय स्थित है। विशेषज्ञों का मानना है कि वियना में होने वाली बातचीत परमाणु मुद्दों पर अधिक केंद्रित हो सकती है।

परमाणु कार्यक्रम पर टकराव

वार्ता समाप्त होने से ठीक पहले ईरानी सरकारी मीडिया ने बताया कि ईरान यूरेनियम संवर्धन जारी रखने के अपने अधिकार से पीछे नहीं हटेगा। साथ ही, तेहरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की मांग पर भी कायम है।

दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन की मांग है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करे और लंबी दूरी की मिसाइल परियोजनाओं पर रोक लगाए। इसके अलावा, अमेरिका चाहता है कि ईरान क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन देना बंद करे।

ईरान का रुख यह है कि बातचीत केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहे और अन्य मुद्दों को इसमें शामिल न किया जाए। यही मतभेद फिलहाल समझौते में बाधा बने हुए हैं।

क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता

अराघची ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई होती है, तो क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को संभावित लक्ष्य माना जाएगा। उन्होंने आगाह किया कि ऐसी स्थिति व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकती है।

उन्होंने कहा कि युद्ध की स्थिति किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं होगी और इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा। पश्चिम एशिया पहले ही कई संघर्षों का सामना कर चुका है और नई अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी प्रभाव डाल सकती है।

आगे की राह पर निगाहें

विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहना अपने आप में सकारात्मक संकेत है, भले ही तत्काल परिणाम सामने न आए हों। जिनेवा की बैठक ने कम से कम बातचीत के रास्ते को खुला रखा है।

अब निगाहें वियना में होने वाली अगली वार्ता पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष अपने-अपने रुख में लचीलापन दिखाते हैं या तनाव की स्थिति बनी रहती है। फिलहाल, कूटनीतिक प्रयास जारी हैं और क्षेत्रीय स्थिरता इन्हीं प्रयासों की सफलता पर निर्भर करती दिख रही है।

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