अंतर्राष्ट्रीय

Rising Violence Against Hindus: बांग्लादेश में फिर लहू-लुहान हुई इंसानियत, हिंदू मजदूर की हुई हत्या

Rising Violence Against Hindus: पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक बार फिर दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहाँ मयमनसिंह जिले में एक कपड़ा फैक्टरी के भीतर सोमवार की शाम चीखों में तब्दील हो गई। यहाँ काम करने वाले 40 वर्षीय हिंदू मजदूर बजेंद्र बिस्वास की गोली लगने से दर्दनाक मौत हो गई। शुरुआती जांच में पुलिस इस (Unintentional Shooting Incident) का नाम दे रही है, लेकिन जिस तरह से एक अल्पसंख्यक मजदूर को निशाना बनाया गया, उसने कई अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय प्रशासन का दावा है कि यह घटना सहकर्मी की लापरवाही का नतीजा थी।

Rising Violence Against Hindus
Rising Violence Against Hindus

अंसार बैरक में चली सरकारी शॉटगन

यह हृदयविदारक घटना मयमनसिंह के भालुका उपजिला स्थित मेहराबाड़ी इलाके की है, जहाँ सुल्ताना स्वेटर्स लिमिटेड नाम की फैक्टरी संचालित होती है। मृतक बजेंद्र बिस्वास फैक्टरी की सुरक्षा के लिए तैनात एक समर्पित (Ansar Force Member) थे। सोमवार शाम करीब 6:45 बजे, जब फैक्टरी परिसर में शांति थी, तभी अचानक गोली चलने की आवाज से हड़कंप मच गया। बजेंद्र, जो सिलहट सदर के कादिरपुर गांव के निवासी थे, लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े और अस्पताल ले जाते समय उन्होंने दम तोड़ दिया।

मजाक की आड़ में छिपी खूनी हकीकत

पुलिस की थ्योरी के मुताबिक, बजेंद्र बिस्वास और उनका 22 वर्षीय सहकर्मी नोमान मियां अंसार बैरक में एक साथ बैठे थे। चश्मदीदों का कहना है कि ड्यूटी पर करीब 20 कर्मी मौजूद थे। इसी बीच नोमान मियां ने कथित तौर पर मजाक करते हुए (Government Issued Shotgun) बजेंद्र पर तान दी। पलक झपकते ही बंदूक से फायर हो गया और गोली सीधे बजेंद्र की बाईं जांघ को चीरती हुई निकल गई। अत्यधिक रक्तस्राव और समय पर उपचार न मिल पाने के कारण उनकी मौत हो गई, जिसके बाद आरोपी नोमान को गिरफ्तार कर लिया गया है।

अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का पैटर्न

बजेंद्र बिस्वास की मौत को केवल एक दुर्घटना मान लेना मुश्किल है, क्योंकि पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों की एक डरावनी श्रृंखला देखी जा रही है। (Religious Minority Persecution) के बढ़ते मामलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा कर दी है। इसी मयमनसिंह जिले में कुछ ही समय पहले दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि वहाँ हिंदू समुदाय के लोग किस कदर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और सुरक्षा बलों के भीतर भी कट्टरता अपनी जगह बना रही है।

दीपू चंद्र दास की वो रूह कंपा देने वाली दास्तां

अभी बजेंद्र की मौत का मातम थमा भी नहीं था कि लोग 18 दिसंबर की उस काली रात को याद कर सिहर उठे। इसी भालुका इलाके में दीपू चंद्र दास नामक हिंदू युवक को न केवल बेदर्दी से पीटा गया, बल्कि उसे (Communal Violence Brutality) का शिकार बनाकर निर्वस्त्र किया गया और जिंदा जला दिया गया। एक के बाद एक होती ये नृशंस हत्याएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या कानून व्यवस्था वास्तव में निष्पक्ष है या अल्पसंख्यकों को केवल सॉफ्ट टारगेट बनाया जा रहा है।

राजबारी से लेकर मयमनसिंह तक फैला मौत का जाल

बांग्लादेश के विभिन्न जिलों में हिंदुओं की लक्षित हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को ही राजबारी जिले में अमृत मंडल नाम के एक अन्य हिंदू व्यक्ति को (Mob Lynching in Bangladesh) के तहत पीट-पीटकर मार डाला गया था। इन तमाम घटनाओं में एक समानता यह है कि शिकार होने वाला व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखता है। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार से अपील की है कि इन मामलों की गहनता से जांच की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये महज संयोग हैं या किसी गहरी साजिश का हिस्सा।

फैक्टरी परिसर में सुरक्षा और भरोसे का संकट

सुल्ताना स्वेटर्स लिमिटेड जैसी बड़ी फैक्ट्रियों में सुरक्षा कर्मियों का ही सुरक्षित न होना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब सुरक्षा के लिए तैनात अंसार सदस्य ही अपने साथियों पर गोलियां चलाएंगे, तो आम मजदूरों का क्या होगा? (Industrial Workplace Safety) के नाम पर यहाँ केवल कागजी खानापूर्ति नजर आती है। बजेंद्र बिस्वास की मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया है, बल्कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के मन में उस डर को और पुख्ता कर दिया है, जिसे मिटाने के दावे अक्सर सरकारें करती रही हैं।

न्याय की गुहार और भविष्य की अनिश्चितता

बजेंद्र के परिजनों और अल्पसंख्यक समाज ने इस मामले में निष्पक्ष जांच और आरोपी नोमान मियां को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की है। उनका मानना है कि (Justice for Minority Victims) तभी संभव है जब अंतरराष्ट्रीय दबाव और निष्पक्ष अदालती कार्यवाही हो। अगर इन हत्याओं को ‘मजाक’ या ‘दुर्घटना’ का लेबल देकर दबाया गया, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना असंभव होगा। बांग्लादेश की शांति और सद्भाव अब अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं।

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