BangladeshElection – शेख हसीना के बिना चुनाव में 60% मतदान
BangladeshElection – बांग्लादेश में वर्ष 2026 के आम चुनाव कई मायनों में अहम साबित हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की गैरमौजूदगी में हुए इस चुनाव में करीब 60 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। अवामी लीग के बहिष्कार के बावजूद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से मतदान संपन्न होना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सीमित छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो अधिकांश मतदान केंद्रों पर स्थिति सामान्य रही।

चुनाव परिणामों के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या बांग्लादेश की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। इसी संदर्भ में दक्षिण एशिया मामलों के जानकार डॉ. श्रीश पाठक ने स्थिति को संतुलित नजरिए से समझाने की कोशिश की।
मतदान प्रतिशत और राजनीतिक संकेत
डॉ. पाठक के अनुसार, बांग्लादेश में पहले भी ऐसे अवसर आए हैं जब प्रमुख दलों ने चुनाव का बहिष्कार किया। लेकिन इस बार दर्ज हुआ मतदान प्रतिशत पिछले अनुभवों की तुलना में अधिक रहा। उनका मानना है कि युवाओं, खासकर नई पीढ़ी की भागीदारी इस बार उल्लेखनीय रही।
उन्होंने कहा कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं था, बल्कि इसे एक तरह के जनमत संग्रह के रूप में भी देखा गया। युवाओं की सक्रिय भागीदारी और व्यापक मतदान यह संकेत देता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा जताया। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आगामी राजनीतिक घटनाक्रम को देखना जरूरी होगा।
मतदान से दूर रहे मतदाताओं की भूमिका
करीब 20 प्रतिशत मतदाताओं के मतदान न करने पर भी चर्चा हो रही है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि यह वर्ग अवामी लीग से जुड़ा हो सकता है। हालांकि डॉ. पाठक इस धारणा से सहमत नहीं दिखे।
उनका कहना है कि चुनावी व्यवहार को केवल समर्थक और विरोधी की श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। हर लोकतंत्र में ऐसे मतदाता होते हैं जो किसी एक दल से स्थायी रूप से नहीं जुड़े होते। इसलिए जो लोग मतदान के लिए नहीं पहुंचे, वे सभी किसी एक दल के समर्थक हों, यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविक राजनीतिक रुझान चुनाव परिणामों के कुछ समय बाद स्पष्ट होता है, जब नई सरकार की नीतियां सामने आती हैं।
अवामी लीग की स्थिति पर सवाल
साल 2024 में जब बीएनपी ने चुनाव का बहिष्कार किया था, तब मतदान प्रतिशत काफी कम रहा था। इस बार अवामी लीग के बहिष्कार के बावजूद मतदान का आंकड़ा अपेक्षाकृत ऊंचा रहा। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी की पकड़ कमजोर हुई है।
डॉ. पाठक ने 1996 के चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भी बहिष्कार के कारण मतदान कम रहा था। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी के जनाधार का आकलन केवल मतदान प्रतिशत से नहीं किया जा सकता। नेतृत्व की अनुपस्थिति में समर्थकों की वास्तविक स्थिति को समझना कठिन होता है। इसलिए यह मान लेना कि अवामी लीग का आधार पूरी तरह समाप्त हो गया है, उचित नहीं होगा।
चुनाव प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय नजर
2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बांग्लादेश पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें टिकी हुई थीं। खासकर पड़ोसी देशों और वैश्विक संस्थाओं की ओर से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निगरानी हो रही थी।
डॉ. पाठक के मुताबिक, इस दबाव के बीच अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव कराना अपने आप में एक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की बड़ी हिंसा या प्रशासनिक चूक स्थिति को अस्थिर कर सकती थी। ऐसे में शांतिपूर्ण मतदान से देश ने एक सकारात्मक संकेत दिया है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर संभावित असर
नई सरकार के गठन के साथ भारत और बांग्लादेश के रिश्तों पर भी नजर रखी जा रही है। डॉ. पाठक का मानना है कि भारतीय कूटनीति अब पहले से अधिक संतुलित और व्यावहारिक हो चुकी है। दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर संवाद की प्रक्रिया जारी है।
उन्होंने कहा कि भौगोलिक और रणनीतिक कारणों से दोनों देशों के रिश्ते महत्वपूर्ण हैं। चाहे किसी भी विचारधारा की सरकार सत्ता में आए, सहयोग और संवाद की आवश्यकता बनी रहती है। भारत ने भी हाल के वर्षों में यह नीति अपनाई है कि वह किसी एक राजनीतिक दल पर निर्भर न रहे, बल्कि जो भी सरकार बने, उसके साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखे।



