स्वास्थ्य

Pregnancy – गर्भावस्था की देखभाल से बच्चे की भविष्य की सेहत पर पड़ सकता है बड़ा असर

Pregnancy – मां की गर्भावस्था केवल प्रसव तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसी दौरान बच्चे के भविष्य के स्वास्थ्य की मजबूत नींव भी तैयार होती है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य, संतुलित वजन, उचित पोषण और जन्म के बाद शुरुआती महीनों में स्तनपान जैसी बातें बच्चे में आगे चलकर कुछ गंभीर बीमारियों के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञ इन निष्कर्षों को सावधानी बरतने का संकेत मानते हैं, हालांकि किसी भी बीमारी के लिए इन्हें अकेला कारण नहीं माना जा सकता।

गर्भावस्था के दौरान बढ़ता वजन क्यों बना चर्चा का विषय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था में आवश्यकता से अधिक वजन बढ़ना भविष्य में बच्चे के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। हाल में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया कि ऐसी महिलाओं के बच्चों में कम उम्र में कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत के कैंसर का खतरा अपेक्षाकृत अधिक देखा गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह संबंध अभी अध्ययन के दायरे में है, लेकिन परिणाम इस दिशा में आगे और शोध की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।

आंत के कैंसर से कैसे जुड़ रहा है यह संबंध

कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत या मलाशय में विकसित होने वाला कैंसर है। लंबे समय तक पेट दर्द रहना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, मल में खून आना या बिना कारण वजन घटना इसके सामान्य संकेत माने जाते हैं। लंदन के किंग्स कॉलेज से जुड़ी शोधकर्ता डॉ. रोजीरड ब्राउनसन-स्मिथ के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान मोटापा या अत्यधिक वजन बढ़ने से भ्रूण में ऐसे जैविक परिवर्तन शुरू हो सकते हैं, जो जीवन के बाद के वर्षों में बीमारी का जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कैंसर कई कारणों के संयुक्त प्रभाव से विकसित होता है।

जन्म के समय वजन और भविष्य की सेहत

शोधकर्ताओं का मानना है कि जन्म के समय शिशु का वजन भी गर्भ के वातावरण का एक संकेत हो सकता है। अधिक वजन के साथ जन्म लेने वाले बच्चों में शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़े कुछ दीर्घकालिक बदलाव देखे जा सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल संतुलन और पोषण की स्थिति बच्चे के अंगों के विकास को प्रभावित कर सकती है। इसी वजह से डॉक्टर गर्भावस्था में नियमित जांच, संतुलित आहार और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार वजन नियंत्रित रखने की सलाह देते हैं।

स्तनपान और एडीएचडी के जोखिम पर अध्ययन

एक अन्य अध्ययन में शुरुआती शिशु देखभाल पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें पाया गया कि जिन बच्चों को जन्म के बाद लगभग छह महीने तक केवल मां का दूध मिला, उनमें अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) के लक्षण अपेक्षाकृत कम पाए गए। एडीएचडी एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चों को ध्यान केंद्रित करने, व्यवहार नियंत्रित करने और लंबे समय तक शांत बैठने में कठिनाई हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने क्या निष्कर्ष निकाले

बायोलॉजिकल साइकेट्री जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में नॉर्वे के 37 हजार से अधिक बच्चों और उनकी माताओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन की प्रमुख शोधकर्ता एवं मनोचिकित्सक डॉ. बेरिट स्क्रेटिंग सोलबर्ग के अनुसार, लंबे समय तक केवल स्तनपान कराने वाले बच्चों में एडीएचडी से जुड़े लक्षण कम देखने को मिले। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध के पीछे काम करने वाले जैविक कारणों को पूरी तरह समझने के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान स्वस्थ जीवनशैली और जन्म के बाद उचित पोषण, बच्चे के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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