FuelDemand – महंगे तेल और कमजोर रुपये से घट सकती है ईंधन खपत
FuelDemand – भारत में पेट्रोल और डीजल की मांग को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये की कमजोरी और ईंधन बचत को लेकर चलाए जा रहे अभियानों के कारण आने वाले समय में ईंधन की खपत कम होने की संभावना जताई जा रही है। ऊर्जा क्षेत्र की विश्लेषण कंपनी केप्लर ने वर्ष 2026 के लिए भारत में ईंधन मांग वृद्धि के अनुमान में बड़ी कटौती की है।

रिपोर्ट के मुताबिक पहले जहां रिफाइंड उत्पादों की मांग वृद्धि 1.28 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान था, अब इसे घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि महंगे ईंधन और बढ़ते आर्थिक दबाव के चलते लोग यात्रा और खर्च दोनों में कटौती कर सकते हैं।
पेट्रोल और डीजल की मांग में गिरावट की आशंका
विश्लेषकों के अनुसार पेट्रोल की मांग वृद्धि के अनुमान में भी उल्लेखनीय कमी की गई है। पहले यह अनुमान 63 हजार बैरल प्रतिदिन था, जिसे अब घटाकर करीब 38 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार बढ़ती ईंधन कीमतों का असर आम लोगों की यात्रा आदतों पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोग अब गैर-जरूरी यात्राओं से बचने लगे हैं। निजी वाहनों के उपयोग में कमी और सार्वजनिक परिवहन की ओर बढ़ता रुझान भी ईंधन खपत को प्रभावित कर सकता है। आर्थिक दबाव के कारण कई परिवार अपने मासिक खर्चों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
वर्क फ्रॉम होम और बचत अभियान का असर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई कंपनियों में अब भी वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था जारी है, जिससे रोजाना आवागमन कम हुआ है। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की मांग पर दिखाई दे रहा है।
इसके अलावा सरकार की ओर से ईंधन बचत और ऊर्जा संरक्षण को लेकर चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों को भी खपत में कमी की एक वजह माना जा रहा है। डीजल की वार्षिक मांग में लगभग 20 हजार बैरल प्रतिदिन तक गिरावट आने का अनुमान लगाया गया है।
विमान ईंधन की मांग पर भी असर
रिपोर्ट में विमान ईंधन यानी एटीएफ की मांग में भी कमी की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय हालात और बढ़ते यात्रा खर्च के कारण लोग हवाई यात्राओं को सीमित कर सकते हैं।
विमानन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि ईंधन की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो एयरलाइंस कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ सकती है। इसका असर टिकट दरों पर भी पड़ सकता है।
लागत और मौजूदा कीमतों के बीच अंतर
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि हाल में सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी की गई है, लेकिन इसके बावजूद मौजूदा दरें तेल कंपनियों की अनुमानित लागत से कम बताई जा रही हैं।
जानकारों के अनुसार देश में पेट्रोल की औसत कीमत करीब 103 रुपये प्रति लीटर है, जबकि लागत संतुलन के लिए यह इससे काफी अधिक होनी चाहिए। इसी तरह डीजल की मौजूदा कीमत भी अनुमानित लागत स्तर से नीचे बताई जा रही है। इससे तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
ईरान संकट से बढ़ी डिलीवरी लागत
अंतरराष्ट्रीय तनाव और ईरान से जुड़े हालात का असर डिलीवरी और परिवहन लागत पर भी दिखाई दे रहा है। हालिया सर्वे के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मार्च से मई के बीच डिलीवरी लागत में करीब 19 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन महंगा होने, परिवहन खर्च बढ़ने और शहरी क्षेत्रों में बढ़ती भीड़भाड़ की वजह से लॉजिस्टिक्स लागत लगातार बढ़ रही है। इसका असर आगे चलकर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।