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EconomicOutlook – महंगे कच्चे तेल के बावजूद भारत की वृद्धि दर मजबूत रहने का अनुमान

EconomicOutlook – वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक आकलन सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी एसएंडपी के मुताबिक, अगर चालू वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 130 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच जाती हैं, तब भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.3 प्रतिशत के आसपास बनी रह सकती है। यह अनुमान इस बात का संकेत देता है कि वैश्विक दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती बरकरार है।

सामान्य स्थिति में और बेहतर रह सकती है वृद्धि

एजेंसी ने यह भी कहा है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत संतुलित स्तर, यानी करीब 85 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती हैं, तो भारत की वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह दर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज मानी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू मांग और निवेश की निरंतरता भारत को इस स्थिति में बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही है।

ऊंची कीमतों से बढ़ सकते हैं आर्थिक जोखिम

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल कुछ जोखिम पैदा कर सकता है। कच्चे तेल के महंगे होने से देश का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, जिससे बाहरी संतुलन पर दबाव आएगा। इसके साथ ही कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है। महंगाई में बढ़ोतरी से आम लोगों की क्रय शक्ति भी प्रभावित हो सकती है, जिसका असर उपभोग पर दिख सकता है।

सरकार पर बढ़ सकता है वित्तीय दबाव

ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर कम करने के लिए सरकार को उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है। इससे राजकोषीय स्थिति पर दबाव बढ़ेगा, हालांकि एजेंसी का मानना है कि इससे देश की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग पर तत्काल कोई बड़ा खतरा नहीं है। सरकार के पास खर्चों में संतुलन बनाने और अन्य क्षेत्रों में कटौती कर घाटे को नियंत्रित करने की क्षमता मौजूद है।

कंपनियों के मुनाफे पर असर की आशंका

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो देश की बड़ी कंपनियों की आय में गिरावट आ सकती है। अनुमान है कि शीर्ष कंपनियों के मुनाफे में 15 से 20 प्रतिशत तक कमी देखने को मिल सकती है। इससे उनके कर्ज का स्तर बढ़ सकता है और वित्तीय दबाव भी बढ़ेगा।

किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर

ऊर्जा पर अधिक निर्भर उद्योगों को इस स्थिति में सबसे ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। खासकर रिफाइनिंग और एविएशन सेक्टर को अधिक संवेदनशील माना गया है। इसके अलावा सीमेंट, धातु और स्टील जैसे क्षेत्र भी प्रभावित हो सकते हैं। ईंधन और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का असर बैंकिंग सेक्टर पर भी पड़ सकता है, क्योंकि इससे ऋण चुकाने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

वैश्विक तनाव का सीमित प्रभाव

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद भारतीय कंपनियों की वित्तीय स्थिति अभी स्थिर बनी हुई है। आयात-निर्यात बैंक के अनुसार, इस क्षेत्र में काम कर रही भारतीय कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर अब तक कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है। कंपनियों के राजस्व स्रोतों में विविधता होने के कारण वे बाहरी झटकों का सामना करने में सक्षम हैं।

आगे की राह पर नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण बने रहते हैं, तो केंद्रीय बैंक और सरकार को कुछ नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं। फिलहाल, भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है, लेकिन ऊर्जा कीमतों और वैश्विक परिस्थितियों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।

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