AstraMissile – भारत की स्वदेशी अस्त्र मिसाइल में बढ़ी वैश्विक देशों की रुचि
AstraMissile– भारत की स्वदेशी हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मिसाइल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुचि लगातार बढ़ रही है। इंडोनेशिया के बाद अब आर्मेनिया और सऊदी अरब ने भी इस रक्षा प्रणाली में दिलचस्पी दिखाई है। हाल के महीनों में विभिन्न स्तरों पर हुई रणनीतिक बैठकों के बाद इन देशों के साथ संभावित रक्षा सहयोग पर चर्चा आगे बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये बातचीत समझौते में बदलती है तो यह भारत के रक्षा निर्यात को नई मजबूती दे सकती है।

इंडोनेशिया के बाद आर्मेनिया ने बढ़ाई बातचीत
सूत्रों के अनुसार, आर्मेनिया भारत से अस्त्र मिसाइल प्रणाली खरीदने की संभावनाओं पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। बताया जा रहा है कि इस वर्ष फरवरी में तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच इस विषय पर चर्चा हुई थी। रक्षा सहयोग से जुड़े जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में आर्मेनिया इस मिसाइल प्रणाली को हासिल करने की दौड़ में प्रमुख दावेदारों में शामिल है।
सुखोई-30 बेड़े के कारण आसान हो सकता है एकीकरण
आर्मेनिया की वायुसेना के पास सुखोई-30 लड़ाकू विमान मौजूद हैं। भारत पहले ही अपने सुखोई-30 विमानों के साथ अस्त्र मिसाइल का सफल एकीकरण कर चुका है। ऐसे में तकनीकी दृष्टि से यह प्रणाली आर्मेनिया के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच निगरानी प्रणाली, अंतरिक्ष तकनीक, साइबर सुरक्षा, सामरिक संचार और सैन्य प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी चर्चा जारी है।
सऊदी अरब की दिलचस्पी के पीछे क्या वजह
सूत्रों के मुताबिक सऊदी अरब भी अस्त्र मिसाइल को लेकर भारत के साथ बातचीत कर रहा है। हालांकि सऊदी वायुसेना के बेड़े में मुख्य रूप से अमेरिकी और ब्रिटिश मूल के लड़ाकू विमान शामिल हैं, लेकिन अस्त्र की अपेक्षाकृत कम लागत और आधुनिक जैमिंग-रोधी तकनीक ने उसका ध्यान आकर्षित किया है। रियाद लंबे समय से अपने रक्षा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति पर काम कर रहा है और इसी दिशा में भारतीय रक्षा उत्पादों को भी एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
पश्चिमी लड़ाकू विमानों के लिए खुल सकते हैं नए अवसर
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में अस्त्र मिसाइल का एकीकरण एफ-15 या यूरोफाइटर टाइफून जैसे पश्चिमी लड़ाकू विमानों के साथ संभव होता है, तो यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। इससे भारतीय रक्षा तकनीक की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ेगी और अन्य देशों के साथ भी सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि इस दिशा में किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है।
रक्षा निर्यात में भारत की बढ़ती भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने स्वदेशी रक्षा उपकरणों के विकास और निर्यात पर विशेष ध्यान दिया है। ब्रह्मोस जैसी मिसाइल प्रणालियों के साथ-साथ अस्त्र जैसी स्वदेशी तकनीकों को भी मित्र देशों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि आर्मेनिया और सऊदी अरब के अलावा कुछ अन्य देश भी इस मिसाइल प्रणाली को लेकर प्रारंभिक स्तर पर जानकारी जुटा रहे हैं। यदि ये वार्ताएं आगे बढ़ती हैं, तो भारत की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी मौजूदगी को और मजबूती मिल सकती है।