Patna Shambhu Girls Hostel Case: पुलिसिया झूठ का हुआ पर्दाफाश और सिस्टम पर बरपा कहर
Patna Shambhu Girls Hostel Case: पटना का शंभू गर्ल्स हॉस्टल आज एक ऐसी मिस्ट्री बन चुका है जिसने बिहार की कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। एक होनहार छात्रा की संदिग्ध मौत ने पूरे राज्य में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है, जहां (criminal investigation procedures) की धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही हैं। पुलिस जिसे पहले दिन से आत्महत्या बता रही थी, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद वह थ्योरी पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उस रात उस बंद कमरे के पीछे ऐसा क्या हुआ जिसे दबाने की कोशिश आला अधिकारी भी कर रहे हैं।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोली पुलिसिया दावों की पोल
जैसे ही छात्रा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, पटना पुलिस के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों के पसीने छूटने लगे। एसएसपी कार्तिकेय कुमार ने शुरुआती जांच में साफ तौर पर कहा था कि पीड़िता के साथ किसी भी तरह की शारीरिक प्रताड़ना या दुष्कर्म नहीं हुआ है। लेकिन (forensic evidence analysis) ने पुलिस के इन दावों को झुठला दिया है, जिससे अब पुलिस की भारी किरकिरी हो रही है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने जानबूझकर मामले को रफा-दफा करने के लिए झूठे बयान दिए और आरोपियों को बचाने का प्रयास किया।
सवालों के घेरे में खाकी और रसूखदार अधिकारी
इस मामले में केवल हॉस्टल संचालक ही नहीं, बल्कि थानाध्यक्ष से लेकर एसपी और एसएसपी तक सवालों के कटघरे में खड़े हैं। परिजनों की मांग है कि अनुसंधान को गुमराह करने के आरोप में इन (high ranking police officials) को भी केस में अभियुक्त बनाया जाना चाहिए। पुलिस का यह दावा कि छात्रा के कमरे से नींद की दर्जनों गोलियां मिली थीं, अब संदेह पैदा कर रहा है क्योंकि एक साधारण छात्रा के लिए इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयां जुटाना मुमकिन नहीं है। क्या यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था जिसे दबाने की कोशिश की गई?
हॉस्टल मालिकों की भूमिका पर गहराता सस्पेंस
आक्रोशित लोगों का गुस्सा इस बात पर है कि पुलिस केवल चुनिंदा लोगों पर ही शिकंजा क्यों कस रही है। पुलिस ने आनन-फानन में मनीष राज उर्फ मनीष रंजन को तो जेल भेज दिया, लेकिन हॉस्टल के मुख्य कर्ताधर्ता नीलम अग्रवाल, श्रवण अग्रवाल और अंशु अग्रवाल से पूछताछ में अब तक ढिलाई क्यों बरती गई? परिजनों का मानना है कि (interrogation of suspects) में पुलिस किसी रसूखदार के दबाव में काम कर रही है। क्या हॉस्टल परिसर के भीतर कोई ऐसा प्रभावशाली सिंडिकेट काम कर रहा है जिसे पुलिस का संरक्षण प्राप्त है?
एसआईटी का गठन और न्याय की आखिरी उम्मीद
मामले की गंभीरता और बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए अब आईजी के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया गया है। पुलिस अब दावा कर रही है कि उनके पास कुछ ऐसे निर्णायक सबूत हैं जो पूरे मामले का रुख ही पलट देंगे। इस (special investigation team update) के आने के बाद उम्मीद जगी है कि अब शायद सच सामने आए। हालांकि, पुलिस की पिछली कार्यशैली को देखते हुए जनता का भरोसा डगमगाया हुआ है और लोग निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़े हुए हैं।
पुलिस की तीन नई थ्योरीज और जांच का जाल
वर्तमान में जांच तीन मुख्य पहलुओं पर केंद्रित हो गई है ताकि छात्रा की मौत की कड़ियों को जोड़ा जा सके। पहली थ्योरी यह है कि जहानाबाद से पटना आने के दौरान छात्रा की मानसिक स्थिति कैसी थी। दूसरी थ्योरी के तहत पुलिस यह पता लगा रही है कि क्या पटना पहुंचने के बाद उसने हॉस्टल जाने से पहले किसी और से मुलाकात की थी। (surveillance footage tracking) के जरिए पुलिस उन स्थानों और लोगों की तलाश कर रही है जहां छात्रा रुकी थी। तीसरी और सबसे अहम थ्योरी यह है कि अगर वह हॉस्टल सामान्य स्थिति में पहुंची थी, तो वह कौन सा कमरा था जहां उसके साथ खौफनाक वारदात को अंजाम दिया गया।
सिस्टम की नाकामी और छात्रा के इंसाफ की जंग
यह मामला केवल एक छात्रा की मौत का नहीं है, बल्कि यह बिहार में लड़कियों की सुरक्षा और पुलिसिंग के ढीले रवैये पर एक बड़ा तमाचा है। एक तरफ सरकार महिला सुरक्षा के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ राजधानी के एक नामी हॉस्टल में छात्रा की जान चली जाती है और (victim rights advocacy) को दरकिनार कर दिया जाता है। अब सबकी नजरें कोर्ट और एसआईटी की फाइनल रिपोर्ट पर टिकी हैं। क्या सिस्टम अपनी गलती सुधारकर अपराधी को सलाखों के पीछे भेजेगा या यह केस भी फाइलों के ढेर में कहीं दब जाएगा



