स्वास्थ्य

Hypersomnia – जरूरत से ज्यादा नींद के संकेत और खतरे

Hypersomnia – आमतौर पर कम नींद को ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है, लेकिन आवश्यकता से अधिक सोना भी उतना ही चिंता का विषय हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लेने के बाद भी दिनभर उनींदा महसूस करता है या बार-बार झपकी लेने की जरूरत पड़ती है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। चिकित्सा भाषा में इस स्थिति को हाइपरसोम्निया कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल थकान का मामला नहीं, बल्कि किसी शारीरिक या मानसिक समस्या का संकेत भी हो सकता है।

जब मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो हमें सतर्क बनाए रखता है, ठीक से काम नहीं करता, तो व्यक्ति काम करते समय, बातचीत के दौरान या वाहन चलाते हुए भी नींद महसूस कर सकता है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो कार्यक्षमता, स्मरण शक्ति और सामाजिक जीवन प्रभावित हो सकते हैं।

संभावित शारीरिक कारण

हाइपरसोम्निया के पीछे कई चिकित्सकीय वजहें हो सकती हैं। स्लीप एपनिया एक प्रमुख कारण माना जाता है, जिसमें नींद के दौरान सांस लेने में बार-बार रुकावट आती है। इससे नींद की गुणवत्ता खराब होती है और दिन में थकान बनी रहती है।

इसके अलावा नार्कोलेप्सी, थायराइड असंतुलन, विटामिन D या B12 की कमी भी अत्यधिक नींद का कारण बन सकती है। कुछ मामलों में लंबे समय तक चलने वाली दवाएं भी उनींदापन बढ़ा सकती हैं। इसलिए लगातार सुस्ती महसूस होने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा पहलू

अत्यधिक नींद कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य से भी संबंधित होती है। अवसाद या चिंता से जूझ रहे लोग अक्सर ऊर्जा की कमी या भावनात्मक थकान के कारण ज्यादा सोने लगते हैं। इसे एटिपिकल डिप्रेशन के लक्षणों में गिना जाता है।

यदि अधिक सोने के साथ उदासी, निराशा या किसी काम में रुचि कम होना भी महसूस हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। समय रहते मदद लेने से स्थिति बिगड़ने से रोकी जा सकती है।

शरीर पर दीर्घकालिक प्रभाव

जरूरत से अधिक सोना शरीर के प्राकृतिक सर्कैडियन रिदम को प्रभावित कर सकता है। इससे मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ सकता है, जिसके कारण वजन बढ़ने की संभावना रहती है। कुछ अध्ययनों में अत्यधिक नींद को हृदय रोग और टाइप-2 मधुमेह के जोखिम से भी जोड़ा गया है।

इसके अलावा लगातार सुस्ती और ब्रेन फॉग की शिकायत से निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। सिरदर्द और थकान जैसी समस्याएं भी बनी रह सकती हैं, जिससे दिनचर्या प्रभावित होती है।

क्या करें और कैसे सुधारें

इस समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए सबसे पहला कदम सही कारण की पहचान है। स्लीप स्टडी या आवश्यक जांच कराकर यह समझा जा सकता है कि समस्या शारीरिक है या मानसिक।

जीवनशैली में छोटे बदलाव भी मददगार हो सकते हैं। नियमित समय पर सोना और जागना, हल्का व्यायाम करना, कैफीन और शराब का सीमित सेवन तथा स्क्रीन टाइम कम करना नींद की गुणवत्ता सुधार सकते हैं।

पर्याप्त और संतुलित नींद शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन यदि जरूरत से ज्यादा नींद आने लगे तो इसे चेतावनी के रूप में समझना चाहिए। समय पर ध्यान देने से कई जटिलताओं से बचाव संभव है।

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