PoliticalShift – सपा में नसीमुद्दीन की नई पारी की शुरुआत
PoliticalShift – कांग्रेस से अलग होने के बाद पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की राजनीतिक दिशा को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। लंबे समय से यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि वह अपनी पुरानी पार्टी बहुजन समाज पार्टी में वापसी की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि हालात ने करवट ली और रविवार को उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल कराया। इस मौके पर कई अन्य नेताओं ने भी सपा की सदस्यता ग्रहण की, जिससे प्रदेश की राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है।

बसपा में वापसी की कोशिशें बेनतीजा
सूत्रों के अनुसार नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा में वापसी के लिए अपने पुराने सहयोगियों के माध्यम से संपर्क साधा था। इतना ही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक मंचों से बसपा अध्यक्ष मायावती की प्रशंसा भी की थी। माना जा रहा था कि वह किसी तरह पार्टी नेतृत्व का विश्वास फिर से हासिल करना चाहते थे। लेकिन पार्टी की ओर से उन्हें कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला। बताया जाता है कि नेतृत्व स्तर पर उनकी वापसी को लेकर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद उन्होंने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद से भी संपर्क साधा, लेकिन वहां भी बात आगे नहीं बढ़ी।
मुस्लिम राजनीति में प्रभावशाली चेहरा
प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लंबे समय तक प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता रहा है। बसपा सरकार के दौरान उन्हें कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी गई थी। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ कहा जाने लगा था, क्योंकि प्रशासनिक फैसलों में उनकी भूमिका अहम मानी जाती थी। विधानसभा के भीतर भी वह मुखर रहे और खासतौर पर आजम खां पर उनके हमले राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माने जाते थे। इसका उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना था। हालांकि वर्ष 2012 के बाद परिस्थितियां बदलीं और बसपा से अलग होते समय उन्होंने मायावती के साथ हुई बातचीत की ऑडियो सार्वजनिक कर दी। इस घटना के बाद उनके लिए पार्टी के दरवाजे लगभग बंद हो गए।
मायावती का बदला रुख और चुनावी अनुभव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा नेतृत्व अब मुस्लिम नेताओं को लेकर पहले जैसा भरोसा नहीं दिखा रहा है। लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 21 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जिनमें अनीस अहमद उर्फ फूल बाबू भी शामिल थे। उन्हें पीलीभीत से टिकट मिला, लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे। चुनावी नतीजों के बाद मायावती ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। 2019 में जीती गई सीटों पर भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा। इन अनुभवों के बाद बसपा अब उम्मीदवार चयन को लेकर अधिक सतर्क रुख अपना रही है।
15 हजार से अधिक समर्थकों के साथ सपा में शामिल
रविवार को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दावा किया कि उनके साथ 15 हजार 718 लोग विभिन्न दलों को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं। उनके साथ पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू ने भी सपा की सदस्यता ली। इस अवसर पर अखिलेश यादव ने कहा कि नसीमुद्दीन ने सिर्फ मकान बदला है, मोहल्ला नहीं, क्योंकि वे अभी भी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं। कार्यक्रम में देवरिया के पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा, प्रतापगढ़ सदर के पूर्व विधायक राजकुमार पाल, कन्नौज से एआईएमआईएम के पूर्व प्रत्याशी डॉ. दानिश खान, पूर्व विधान परिषद सदस्य हुस्ना सिद्दीकी, पूनम पाल और ड्रोन पायलट रंजना पाल समेत कई अन्य नेता भी शामिल हुए।
2027 की तैयारी पर जोर
सपा में शामिल होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि उनका लक्ष्य 2027 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाना है। उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत होगी तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा। अखिलेश यादव ने नए साथियों को राजनीतिक सम्मान देने का भरोसा दिलाया और संकेत दिया कि आगामी चुनावों में उन्हें अवसर दिया जाएगा। होली से पहले आयोजित इस कार्यक्रम को पार्टी ने सामाजिक समरसता के संदेश से भी जोड़ा। राजनीतिक हलकों में इसे आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम कदम माना जा रहा है।