Primary Teacher Adjustment Case UP: शिक्षकों की जीत या बस तारीख पे तारीख, हाईकोर्ट ने रोका योगी सरकार का समायोजन वाला महाप्लान
Primary Teacher Adjustment Case UP: उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा देने वाले प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन-3 मामले में एक नया मोड़ आ गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सोमवार को इस विवादास्पद प्रक्रिया पर लगी रोक को आगे बढ़ाने का आदेश जारी किया है। पहले यह रोक 19 जनवरी तक प्रभावी थी, जिसे अब (Lucknow Bench Interim Order) के माध्यम से 2 फरवरी तक के लिए विस्तारित कर दिया गया है। इस फैसले से उन हजारों शिक्षकों को फिलहाल राहत मिली है, जो जबरन तबादले और पदस्थापना के डर के साए में जी रहे थे।

बेसिक शिक्षा विभाग के हाथ बंधे
न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की एकल पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई तक कोई भी नई कार्यवाही नहीं की जाएगी। याची शिक्षकों की अधिवक्ता मीनाक्षी सिंह परिहार ने कोर्ट के रुख को स्पष्ट करते हुए बताया कि (Basic Education Department UP) के किसी भी अधिकारी को अब 2 फरवरी तक समायोजन प्रक्रिया में एक कदम भी आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं होगी। यह अंतरिम आदेश केवल मुख्य याचिकाकर्ताओं पर ही नहीं, बल्कि इस मामले से जुड़ी अन्य सभी याचिकाओं पर भी समान रूप से लागू होगा।
बाराबंकी से उठी विरोध की चिंगारी
यह पूरा कानूनी विवाद बाराबंकी की संगीता पाल समेत 29 प्राथमिक शिक्षकों द्वारा दायर की गई याचिका से शुरू हुआ था। इन शिक्षकों ने 14 नवंबर 2025 को राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए उस शासनादेश को (Teacher Transfer Policy Challenge) के तहत रद्द करने की मांग की है, जो समायोजन के नए नियम तय करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सरकार का यह कदम न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की मूल संरचना के साथ भी खिलवाड़ है।
क्या नियमों की धज्जियां उड़ा रही है सरकार
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एच.जी.एस. परिहार ने सरकार की मंशा पर कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने दलील दी कि 14 नवंबर का शासनादेश (RTE Act Compliance Issues) के मानकों और उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 के स्पष्ट नियमों का उल्लंघन करता है। कानून के मुताबिक, किसी भी शिक्षक को उसकी सहमति के बिना समायोजित करना नियमों के विरुद्ध है, जिसे सरकार नजरअंदाज करने की कोशिश कर रही है।
वरिष्ठता और छात्र-शिक्षक अनुपात पर संकट
शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता उनकी सीनियरिटी को लेकर है, जो इस नए समायोजन के कारण खतरे में पड़ सकती है। अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि इस प्रक्रिया से जहां शिक्षकों की वर्षों की मेहनत और पदोन्नति के अवसर प्रभावित होंगे, वहीं स्कूलों में (Student Teacher Ratio Discrepancy) जैसी विसंगतियां भी पैदा हो जाएंगी। अगर छात्र-शिक्षक का सही संतुलन बिगड़ता है, तो इसका सीधा असर प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा, जो आरटीई अधिनियम के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
राज्य सरकार को मिला जवाब देने का मौका
अदालत ने जहां एक तरफ शिक्षकों को अंतरिम राहत प्रदान की है, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का समय भी दिया है। सुनवाई के दौरान (State Government Legal Response) दाखिल करने के लिए सरकारी वकील ने वक्त मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अब सरकार को यह साबित करना होगा कि उनका 14 नवंबर का शासनादेश संवैधानिक रूप से वैध है और इससे किसी भी शिक्षक के हितों का नुकसान नहीं हो रहा है।
लखनऊ पीठ में याचिकाओं की लगी कतार
प्राथमिक शिक्षकों के समायोजन का मुद्दा अब केवल 29 शिक्षकों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे जुड़ी दर्जनों याचिकाएं लखनऊ पीठ के समक्ष लंबित हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि (Stay Extension for Teachers) का लाभ उन सभी प्रार्थियों को मिलेगा जिन्होंने इस नीति को चुनौती दी है। यह एकजुटता दर्शाती है कि शिक्षक समुदाय अपनी सेवा शर्तों में होने वाले किसी भी मनमाने बदलाव को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
क्या 2 फरवरी को होगा अंतिम फैसला
अगली सुनवाई की तिथि 2 फरवरी तय की गई है, जो बेसिक शिक्षा विभाग और प्रदेश के शिक्षकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाली है। कानून के जानकारों का मानना है कि यदि सरकार (High Court Judicial Proceedings) के दौरान ठोस जवाब पेश नहीं कर पाई, तो इस समायोजन नीति पर स्थायी रोक भी लग सकती है। फिलहाल, शिक्षकों की नजरें सरकार के जवाबी हलफनामे और कोर्ट की अगली टिप्पणी पर टिकी हुई हैं।
शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती विसंगतियां
इस विवाद ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त प्रशासनिक खामियों को उजागर कर दिया है। शिक्षकों का कहना है कि समायोजन के नाम पर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है और (Service Rules Violation) को प्रशासनिक सुधार का नाम दिया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या अदालत शिक्षा विभाग को नियमों के दायरे में रहकर काम करने का निर्देश देती है या सरकार अपनी नीति पर कायम रहती है।
शिक्षकों के हक की कानूनी लड़ाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नीति को लागू करने से पहले उसके कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं की जांच आवश्यक है। (Legal Rights of Primary Teachers) की रक्षा के लिए अधिवक्ता मीनाक्षी सिंह परिहार और उनकी टीम मजबूती से डटी हुई है। 2 फरवरी तक का यह समय उत्तर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा विभाग, दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी है, जहां न्याय की उम्मीद में हजारों शिक्षक टकटकी लगाए बैठे हैं।



