उत्तराखण्ड

Vasant Vihar Police Negligence Case: सामने आया ‘मित्र पुलिस’ का शर्मनाक चेहरा, खाकी ने निभाई आरोपी से दोस्ती

Vasant Vihar Police Negligence Case: देहरादून के बसंत विहार इलाके से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ‘मित्र पुलिस’ के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। यहाँ पुलिस ने एक 73 वर्षीय घायल बुजुर्ग को न्याय दिलाने के बजाय (Accused Protection) के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। खाकी की इस संवेदनहीनता के कारण एक पीड़ित परिवार को न केवल शारीरिक कष्ट झेलना पड़ा, बल्कि मानसिक रूप से भी प्रताड़ित होना पड़ा। पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल अब महकमे के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

Vasant Vihar Police Negligence Case
Vasant Vihar Police Negligence Case

समझौते के लिए बनाया गया नाजायज दबाव

पीड़ित परिवार का आरोप है कि बसंत विहार पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने के बजाय उन्हें बार-बार समझौते के लिए मजबूर किया। कानून के रखवालों ने (Police Ethics Violation) की सारी सीमाएं पार करते हुए पीड़ित युवती का मोबाइल नंबर और घर का पता आरोपी को थमा दिया। इसका मकसद केवल यह था कि आरोपी पक्ष पीड़ित परिवार को डरा-धमका कर या लालच देकर मामले को रफा-दफा करवा सके। जब मानवता को शर्मसार करने वाली ये कोशिशें नाकाम रहीं, तब जाकर पुलिस की नींद टूटी।

बेटी बनी जासूस, खुद तलाश निकाला सुराग

जब पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए, तब घायल बुजुर्ग की बेटी अनुष्का ने खुद ही इंसाफ की कमान संभाली। वह कई दिनों तक (CCTV Evidence Collection) के लिए घटनास्थल के आसपास की दुकानों और घरों के चक्कर काटती रही। कड़ी मशक्कत के बाद उसने न केवल आरोपी की बाइक का नंबर खोजा, बल्कि उसका नाम और पता भी ढूंढ निकाला। विडंबना देखिए कि जो काम पुलिस को घंटों में करना चाहिए था, उसके लिए एक बेटी को सड़कों की खाक छाननी पड़ी।

लापरवाही की वजह से बुजुर्ग की हालत नाजुक

यह पूरी घटना 3 दिसंबर 2025 की सुबह की है, जब जीएमएस रोड निवासी 73 वर्षीय राजेश चड्ढा दूध लेने निकले थे। तभी एक तेज रफ्तार बाइक सवार ने (Dangerous Driving) का मुजाहिरा करते हुए उन्हें गलत दिशा से आकर जोरदार टक्कर मार दी। बुजुर्ग सड़क पर ही लहूलुहान होकर गिर पड़े और तड़पने लगे। आरोपी युवक इतना संवेदनहीन था कि वह मदद करने के बजाय मौके से फरार हो गया, जिससे बुजुर्ग की जान पर बन आई थी।

अस्पताल के बिस्तर और थानों के चक्कर

इस भीषण दुर्घटना में राजेश चड्ढा के चेहरे पर गंभीर चोटें आईं, जिसके कारण उन्हें सात टांके लगाने पड़े। इतना ही नहीं, उनके (Knee Fracture Surgery) के लिए डॉक्टरों को बड़ा ऑपरेशन करना पड़ा। एक तरफ घर का बुजुर्ग अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ उनकी बेटी अनुष्का प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए चौकी से लेकर थाने के चक्कर काट रही थी। थानाध्यक्ष से मिलने के बावजूद उन्हें केवल टाल-मटौल वाला जवाब ही मिला।

38 दिनों की लंबी और थकाऊ प्रतीक्षा

न्याय की आस में बैठी बेटी को पुलिस के ढुलमुल रवैये के कारण 38 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। एक स्पष्ट (Hit and Run Case) होने के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने में एक महीने से ज्यादा का समय बर्बाद कर दिया। यह देरी दर्शाती है कि स्थानीय पुलिस किस कदर रसूखदारों या अपने करीबियों को बचाने के लिए कानून की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है। इस देरी ने पुलिस की छवि को जनता की नजरों में धूमिल कर दिया है।

थानाध्यक्ष की दलीलों ने चौंकाया

जब इस देरी पर सवाल उठाए गए, तो थानाध्यक्ष अशोक राठौड़ ने एक बेहद चौंकाने वाला तर्क दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि (Legal Procedure Delay) की मुख्य वजह दोनों पक्षों के बीच चल रही समझौते की बातचीत थी। सवाल यह उठता है कि क्या गंभीर चोट वाले आपराधिक मामलों में पुलिस को एफआईआर रोकने और समझौता कराने का वैधानिक अधिकार है? थानाध्यक्ष का यह बयान खुद पुलिस की कार्यशैली पर आत्मघाती साबित हो रहा है।

खाकी पर उठते गंभीर सवाल

यह मामला केवल एक दुर्घटना का नहीं है, बल्कि सिस्टम की उस सड़न का है जहाँ रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं। (Public Trust in Police) को बहाल करने के लिए उच्च अधिकारियों को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर एक बेटी को अपने पिता के लिए इंसाफ मांगने के लिए खुद ही सुबूत जुटाने पड़ें और पुलिस आरोपी की मददगार बन जाए, तो आम आदमी की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।

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