Shankaracharya – लखनऊ में गौ-रक्षा मुद्दे पर प्रशासनिक कार्रवाई पर जताई चिंता
Shankaracharya – ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने लखनऊ के आशियाना क्षेत्र में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान गौ-रक्षा से जुड़े मामलों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में गौ-रक्षा के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं और संतों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई चिंता का विषय है। उनके अनुसार, ऐसे लोगों को प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जबकि वे स्वयं को गौ-सेवा और संरक्षण के कार्यों से जुड़ा बताते हैं।

संतों और गौ-रक्षकों के समर्थन में रखी बात
सभा को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि गौ-रक्षा से जुड़े अभियान चला रहे लोगों के साथ पुलिस द्वारा सख्ती बरते जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने दावा किया कि कुछ कार्यकर्ताओं को नजरबंद किए जाने और उन्हें गतिविधियों से दूर रहने के लिए दबाव बनाए जाने जैसी सूचनाएं मिली हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे आरोप सही हैं, तो यह गंभीर विषय है और इस पर संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाना चाहिए।
कौशांबी का उदाहरण देकर उठाए सवाल
अपने संबोधन में उन्होंने कौशांबी जिले का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां से ऐसी जानकारी मिली है कि देर रात पुलिस कर्मी कुछ गौ-रक्षकों के घर पहुंचे और उनसे अभियान से दूरी बनाने की बात कही। शंकराचार्य ने इन दावों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या प्रदेश में गौ-रक्षा से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाने वाले संतों और धर्माचार्यों को अपनी बात रखने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी पक्षों को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
प्रशासनिक रवैये पर जताई नाराजगी
शंकराचार्य ने अपने संबोधन के दौरान प्रशासन के कथित रवैये पर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि धार्मिक और सामाजिक विषयों पर सक्रिय लोगों के साथ यदि कठोर व्यवहार किया जाता है, तो इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि यदि किसी मामले में कार्रवाई आवश्यक हो तो वह कानून के दायरे में निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जाए।
पौराणिक संदर्भ देकर व्यक्त की चिंता
अपने वक्तव्य में शंकराचार्य ने मौजूदा परिस्थितियों की तुलना पौराणिक काल के कंस और रावण के शासन से करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि समाज में संवाद और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए तथा धार्मिक संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात को भी सुना जाना चाहिए। उनका यह बयान धार्मिक सभा के दौरान दिया गया, जिसमें उन्होंने गौ-रक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंता सार्वजनिक रूप से व्यक्त की।