राष्ट्रीय

CourtVerdict – मानसिक स्वास्थ्य आधार पर महिला को हाई कोर्ट से मिली राहत

CourtVerdict – केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वर्ष 2016 के एक चर्चित मामले में दोषी ठहराई गई महिला को राहत प्रदान की है। महिला को अपने 15 माह के बच्चे की मौत से जुड़े मामले में निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं का विस्तृत परीक्षण करने के बाद उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि घटना के समय महिला गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति में थी और उपलब्ध रिकॉर्ड से यह भी संकेत मिलता है कि उसने स्वयं अपना जीवन समाप्त करने का प्रयास किया था। न्यायालय ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए मामले का पुनर्मूल्यांकन किया।

आत्महत्या के प्रयास से जुड़े साक्ष्यों पर अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति केवी जयकुमार की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसे कई तथ्य मौजूद थे जो महिला की मानसिक स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। अदालत के अनुसार, महिला ने बड़ी मात्रा में दवा का सेवन किया था और उसके शरीर पर स्वयं को नुकसान पहुंचाने से संबंधित चोटों के संकेत भी पाए गए थे।

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि महिला द्वारा एक नोट लिखे जाने की जानकारी सामने आई थी, जो उस समय उसकी मानसिक अवस्था को समझने में महत्वपूर्ण माना गया। न्यायालय का मत था कि ये सभी परिस्थितियां इस ओर संकेत करती हैं कि वह गहरे मानसिक दबाव और भावनात्मक संकट से गुजर रही थी।

अभियोजन पक्ष की दलीलों पर विचार

सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि महिला को आत्महत्या के प्रयास से संबंधित प्रावधान के तहत दोषमुक्त किया जा चुका था, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत मिलने वाले अनुमान का लाभ उसे नहीं दिया जा सकता। हालांकि उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि निचली अदालत में सुनवाई के दौरान संबंधित आरोप को गंभीरता से आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं किया गया था। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कानूनी संरक्षण को नकारना उचित नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों का मूल्यांकन व्यापक संदर्भ में किया जाना चाहिए।

चोटों की गंभीरता पर भी दी स्पष्ट व्याख्या

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आत्महत्या के प्रयास से जुड़े मामलों में केवल चोटों की गंभीरता को आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के अनुसार, कानून का मुख्य ध्यान उस प्रयास और उससे जुड़े कार्यों पर होता है, न कि केवल इस बात पर कि चोटें कितनी घातक थीं।

पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति मानसिक संकट की स्थिति में आत्मघाती कदम उठाने का प्रयास करता है, तो उसके पीछे की परिस्थितियों और मानसिक स्थिति का मूल्यांकन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी आधार पर निचली अदालत की कुछ कानूनी व्याख्याओं से असहमति जताई गई।

पारिवारिक उत्पीड़न के आरोप भी आए थे सामने

मामले में महिला ने दावा किया था कि विवाह के बाद उसे लगातार मानसिक और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ा। उसने आरोप लगाया था कि उसके चरित्र और बच्चे के पितृत्व को लेकर सवाल उठाए गए, जिससे उसे गहरा मानसिक आघात पहुंचा। इसके अलावा दहेज की मांग और कथित प्रताड़ना के आरोप भी उसके पक्ष की ओर से रखे गए थे।

महिला का कहना था कि इन परिस्थितियों के कारण वह मानसिक रूप से बेहद कमजोर हो गई थी और इसी तनाव के बीच उसने वर्ष 2016 में आत्महत्या का प्रयास किया। उसने यह भी कहा था कि दवाएं लेने के बाद वह बेहोश हो गई थी और उसके बाद की घटनाओं की उसे स्पष्ट जानकारी नहीं थी।

दोषसिद्धि और सजा को किया रद्द

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद केरल उच्च न्यायालय ने महिला की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया। यह फैसला मानसिक स्वास्थ्य और आपराधिक मामलों के बीच संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी चर्चा का विषय बन गया है।

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