CourtVerdict – 37 साल पुराने एसिड हमले के मामले में बरी हुए दंपति
CourtVerdict – महाराष्ट्र के ठाणे जिले की एक अदालत ने करीब 37 वर्ष पुराने हत्या के प्रयास के मामले में फरार चल रहे दंपति को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि लंबे समय तक मामला लंबित रहने के कारण न तो अधिकांश गवाहों का पता लगाया जा सका और न ही केस से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित हालत में उपलब्ध रहे। न्यायालय ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

पुराने विवाद से जुड़ा था मामला
यह मामला वर्ष 1989 का है, जब उल्हासनगर इलाके में कचरा फेंकने को लेकर पड़ोसियों के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि इसी विवाद के दौरान एक दंपति ने अपने पड़ोसी पर तेजाब से हमला किया। घटना के बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 307 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था। बाद में यह केस जिला अदालत से स्थानांतरित होकर कल्याण सत्र न्यायालय पहुंचा।
जमानत के बाद फरार हो गए थे आरोपी
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी दंपति जमानत मिलने के बाद लंबे समय तक अदालत में पेश नहीं हुए और बाद में उन्हें फरार घोषित कर दिया गया। इसी वजह से मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक आगे नहीं बढ़ सकी। न्यायालय ने हाल ही में पुराने लंबित मामलों को प्राथमिकता देने संबंधी निर्देशों के तहत इस केस की फिर से समीक्षा शुरू की थी।
गवाह और दस्तावेज दोनों बने बड़ी चुनौती
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पीआर अष्टुरकर ने अपने आदेश में कहा कि घटना को कई दशक बीत जाने के कारण अभियोजन पक्ष अधिकांश गवाहों का पता नहीं लगा पाया। अदालत ने यह भी कहा कि केस से जुड़े दस्तावेज इतने पुराने और क्षतिग्रस्त हो चुके थे कि उन्हें पढ़ना तक मुश्किल हो गया था। न्यायाधीश के अनुसार, ऐसे हालात में आरोप साबित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध नहीं रहे।
केवल औपचारिक गवाही ही हो सकी दर्ज
मुकदमे के दौरान पुलिस विभाग की ओर से केवल एक पुलिस कांस्टेबल की औपचारिक गवाही दर्ज की गई। पुलिस अधिकारी ने अदालत को बताया कि आरोपपत्र में शामिल व्यक्तियों और स्वतंत्र गवाहों का कोई पता नहीं चल सका। पीड़ित पक्ष से जुड़े लोगों का भी वर्षों बाद कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो पाया। इसी कारण अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया।
अदालत ने सुनवाई जारी रखने को बताया निरर्थक
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब न तो पर्याप्त सबूत बचे हों और न ही पक्षकारों का कोई स्पष्ट पता हो, तब मुकदमे को अनिश्चितकाल तक जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का प्रभावी उपयोग नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश ने कहा कि आरोपियों का तीन दशक से अधिक समय से कोई ठिकाना सामने नहीं आया है और भविष्य में उनके मिलने की संभावना भी बेहद कम है।
पुराने जमानती बांड भी किए गए रद्द
फैसले के साथ अदालत ने आरोपियों के पुराने जमानती बांड रद्द करने का आदेश दिया। साथ ही मामले में जब्त किए गए एक चाकू को आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए जिला प्रशासन को सौंपने के निर्देश भी दिए गए। अदालत ने साफ किया कि उपलब्ध परिस्थितियों और रिकॉर्ड के आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाना उचित है।