Justice – महिला अधिवक्ता हमले मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त
Justice – दिल्ली में महिला अधिवक्ता पर हुए गंभीर हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को जांच प्रक्रिया जल्द पूरी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने पीड़िता और उसके बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर भी जोर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले की जांच पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए ताकि पीड़िता को न्याय मिल सके।

स्वतः संज्ञान लेकर अदालत ने दिखाई गंभीरता
यह मामला तब चर्चा में आया जब अधिवक्ता स्नेहा कलिता द्वारा भेजे गए एक पत्र के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। पत्र में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप के साथ राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की पीड़ित मुआवजा योजना के तहत सहायता की मांग की गई थी। आरोप है कि 22 अप्रैल को दिल्ली के सोनिया विहार इलाके में महिला पर उसके पति ने तलवार से हमला किया था, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई थीं।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत को स्थिति रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में बताया गया कि मामले में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर जांच जारी है। इस पर अदालत ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि मामले की प्रक्रिया अनावश्यक देरी के बिना पूरी की जाए और पीड़िता की सुरक्षा में किसी तरह की लापरवाही न हो।
बच्चों की पढ़ाई और देखभाल को लेकर निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की दोनों बेटियों की शिक्षा और देखभाल को लेकर भी महत्वपूर्ण आदेश दिए। अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि बच्चियों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, जिसमें प्लेस्कूल से लेकर नियमित स्कूल तक की व्यवस्था शामिल हो। इसके अलावा फीस, किताबें, स्कूल वर्दी और सार्वजनिक परिवहन का खर्च भी सरकार वहन करेगी।
पीठ ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार की मौजूदा योजनाओं के तहत बच्चियों को वजीफा या अन्य आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने चार वर्ष और एक वर्ष की दोनों नाबालिग बेटियों की कस्टडी फिलहाल उनकी मां को सौंपने का आदेश दिया। साथ ही राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता के लिए तीन लाख रुपये की अंतरिम सहायता राशि जारी करने का निर्देश भी दिया गया।
नीट परीक्षा विवाद भी पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
इसी बीच, नीट-यूजी 2026 परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के विवाद ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने याचिका दाखिल कर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को मौजूदा स्वरूप में भंग करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि परीक्षा संचालन में गंभीर स्तर की प्रशासनिक विफलताएं सामने आई हैं, जिससे लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा गया है कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है। संगठन ने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने में असफल रही है। मामले को लेकर छात्रों और अभिभावकों के बीच भी चिंता का माहौल बना हुआ है।
न्यायिक हस्तक्षेप से बढ़ी उम्मीदें
दोनों मामलों में सुप्रीम Court की सक्रियता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर अदालत ने महिला सुरक्षा और पीड़ित सहायता को लेकर सख्त रुख अपनाया है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग पर भी सुनवाई शुरू हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन मामलों में आने वाले फैसले भविष्य की नीतियों और प्रशासनिक जवाबदेही पर असर डाल सकते हैं।