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SupremeCourt – प्रेमी जोड़े की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दी अहम सलाह

SupremeCourt – परिवार से जान का खतरा बताकर सुरक्षा की मांग करने पहुंचे एक प्रेमी जोड़े को सुप्रीम कोर्ट ने सीधे राहत देने के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित उच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए। यह मामला तब सामने आया जब जोड़ा सोशल मीडिया पर देखी गई जानकारी के आधार पर यह मान बैठा था कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में शादी करने से उन्हें तुरंत सुरक्षा मिल जाएगी।

उच्च न्यायालय जाने की दी सलाह

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील से कहा कि वे इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रखें। अदालत ने साफ किया कि संवैधानिक ढांचे में हर न्यायालय की अपनी भूमिका तय है और सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना उचित प्रक्रिया नहीं माना जाता। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर क्यों लोग उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को नजरअंदाज करते हैं, जबकि ऐसे मामलों के समाधान के लिए वे पूरी तरह सक्षम हैं।

सोशल मीडिया से फैली गलतफहमी

मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि युवा जोड़ा सोशल मीडिया रीलों से प्रभावित होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। उन्हें यह गलतफहमी हो गई थी कि अदालत परिसर में विवाह करने से उन्हें कानूनी सुरक्षा तुरंत मिल जाएगी। अदालत ने इस पर अप्रत्यक्ष रूप से चिंता जताते हुए संकेत दिया कि इस तरह की भ्रांतियां लोगों को गलत दिशा में ले जा सकती हैं और कानूनी प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा करती हैं।

पुलिस पर भी उठे सवाल

जोड़े के वकील ने बताया कि उन्हें यह युवक-युवती सुप्रीम कोर्ट की पार्किंग में मिले थे। उन्होंने दावा किया कि दोनों को अपने परिवारों से गंभीर खतरा था, क्योंकि उनके रिश्ते को लेकर परिवारों का कड़ा विरोध था। वकील के अनुसार, उन्होंने जोड़े को तिलक मार्ग पुलिस थाने भी ले जाया, लेकिन वहां सुरक्षा देने के बजाय पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने की कोशिश की। हालांकि इस आरोप पर अदालत में विस्तृत सुनवाई नहीं हुई, लेकिन मामला चर्चा का विषय जरूर बना।

न्यायिक व्यवस्था की भूमिका पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत व्यापक अधिकार दिए गए हैं, जिनका उपयोग ऐसे मामलों में किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्ष को उच्च न्यायालय से संतोषजनक राहत नहीं मिलती, तो वह आगे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे, जिन्होंने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया।

कानूनी जागरूकता की जरूरत

यह पूरा मामला इस बात को रेखांकित करता है कि आम लोगों में कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर सही जानकारी का अभाव है। सोशल मीडिया पर उपलब्ध अधूरी या भ्रामक जानकारी कई बार लोगों को गलत फैसले लेने के लिए प्रेरित कर सकती है। अदालत की टिप्पणी से यह संदेश गया कि किसी भी कानूनी राहत के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है, ताकि न्याय प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर सके।

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