Uttarakhand Education Department: सरकारी स्कूलों में हाईटेक शिक्षा का दावा, लेकिन सैकड़ों विद्यालयों में बिजली और पानी का अभाव
Uttarakhand Education Department: उत्तराखंड के शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग ने राज्य के सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को आधुनिक बनाने के जोश में कंप्यूटर तो बांट दिए, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि प्रदेश के सैकड़ों स्कूलों में अभी तक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंच पाई हैं। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के 275 स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है, वहीं 191 विद्यालयों में छात्र-छात्राओं के लिए पीने के साफ पानी का कोई इंतजाम नहीं है। संसाधनों की इस भारी कमी ने सरकारी दावों और धरातल की सच्चाई के बीच के बड़े अंतर को उजागर कर दिया है।

कड़ाके की ठंड में जमीन पर बैठने को मजबूर नौनिहाल
एक ओर विभाग डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लासरूम की बातें कर रहा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे की स्थिति दयनीय बनी हुई है। पहाड़ी जिलों में पड़ रही भीषण ठंड के बावजूद कई स्कूलों में बच्चों के लिए पर्याप्त फर्नीचर तक उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण बच्चे सर्द फर्श पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। प्यास बुझाने के लिए बच्चों को स्कूल परिसर से बाहर जाना पड़ता है क्योंकि पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि विभाग का पूरा ध्यान केवल खरीदारी और उपकरणों के वितरण पर है, जबकि बच्चों की प्राथमिक जरूरतों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
बिजली और पानी के संकट से जूझते जिलों का ब्योरा
शिक्षा विभाग की हालिया रिपोर्ट राज्य के विभिन्न जिलों में व्याप्त बदहाली की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। बिजली के अभाव वाले स्कूलों में पौड़ी (66), अल्मोड़ा (58), और नैनीताल (54) सबसे आगे हैं। इसके अलावा पिथौरागढ़ के 43 और बागेश्वर के 14 स्कूलों में भी अंधेरा पसरा है। वहीं, पेयजल संकट की बात करें तो पिथौरागढ़ जिले की स्थिति सबसे चिंताजनक है, जहां 89 स्कूलों में पानी का कनेक्शन नहीं है। नैनीताल के 43 और अल्मोड़ा व पौड़ी के 15-15 स्कूलों में भी बच्चे पानी के लिए तरस रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि राजधानी देहरादून और ऋषिकेश जैसे क्षेत्रों के करीब भी कई स्कूलों में ये मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच सकी हैं।
स्वच्छता और शौचालय की कमी ने बढ़ाई मुश्किलें
सिर्फ बिजली और पानी ही नहीं, बल्कि स्वच्छता के मामले में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, देहरादून जैसे विकसित जिले के 4 स्कूलों और टिहरी के 3 स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है। जिन विद्यालयों में शौचालय बने भी हैं, वहां सफाई व्यवस्था नगण्य है। उचित देखरेख और सफाई कर्मचारी न होने के कारण छात्र-छात्राओं, विशेषकर छात्राओं को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वच्छ भारत मिशन के दावों के बीच स्कूलों में शौचालय न होना विभाग की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
बिना बिजली के कंप्यूटर वितरण पर उठे भ्रष्टाचार के सवाल
राज्य के 12,698 सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन सवाल यह है कि जिन 275 स्कूलों में बिजली ही नहीं है, वहां ये कंप्यूटर कैसे चलेंगे? कई शिक्षक संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया है कि यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करती है। शिक्षकों का कहना है कि बिना बिजली और सुरक्षित भवनों के कंप्यूटर भेजना केवल बजट खपाने का जरिया है। कुछ जानकारों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है ताकि यह साफ हो सके कि किस आधार पर और किसके लाभ के लिए बिना तैयारी के हाईटेक उपकरणों की खरीद की गई।
जर्जर भवन और सुरक्षा की अनदेखी
कंप्यूटर और तकनीक से पहले स्कूलों के जर्जर भवनों की मरम्मत करना विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए थी। राज्य के कई पहाड़ी जिलों में स्कूल भवन इतने पुराने और खराब हो चुके हैं कि वहां बच्चों को बिठाना किसी खतरे से खाली नहीं है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि विभाग को पहले बिजली, पानी, शौचालय और सुरक्षित कमरों पर बजट खर्च करना चाहिए था। डिजिटल शिक्षा का लाभ तभी मिल सकता है जब स्कूलों में बिजली हो और कंप्यूटर चलाने के लिए सुरक्षित वातावरण हो। वर्तमान स्थिति में विभाग के हाईटेक होने के दावे खोखले नजर आते हैं।



