Reverse Migration in Uttarakhand: देवभूमि की मिट्टी ने पुकारा, सात समंदर पार की नौकरियां छोड़ लौटे प्रवासी
Reverse Migration in Uttarakhand: उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों और गहरी घाटियों में अब वीरानी नहीं, बल्कि खुशहाली की आहट सुनाई दे रही है। सालों पहले रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ने वाले प्रवासी अब (Return to roots) के संकल्प के साथ वापस लौट रहे हैं। यह महज एक वापसी नहीं है, बल्कि यह उन अनुभवों और हुनर का समागम है जो ये प्रवासी दुनिया भर के बड़े शहरों से सीखकर आए हैं। अपने गांव की आबोहवा में फिर से बसने का यह जज्बा अब पहाड़ की आर्थिकी की नई रीढ़ बन रहा है।

विदेशी चकाचौंध को ठुकराकर वतन का प्यार
उत्तराखंड पलायन निवारण आयोग की ताजा रिपोर्ट-2025 के आंकड़े चौंकाने वाले और सुखद हैं। पिछले पांच वर्षों में चीन, दुबई, फ्रांस और कैलिफोर्निया जैसे विकसित देशों से (Overseas migrants return) का सिलसिला तेज हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 169 प्रवासी सीधे विदेशों से अपने पैतृक गांवों में लौटे हैं। इन लोगों ने मॉरीशस से लेकर जापान और ऑस्ट्रेलिया तक की सुख-सुविधाएं देखी थीं, लेकिन अंततः उन्होंने देवभूमि की मिट्टी में ही अपनी कामयाबी की नई इबारत लिखने का फैसला किया, जिसमें टिहरी जिले के प्रवासियों की संख्या सर्वाधिक है।
कृषि और बागवानी में दिखी सुनहरी संभावनाएं
गांव लौटे इन प्रवासियों ने केवल वापसी ही नहीं की, बल्कि अपने साथ आधुनिक व्यापारिक दृष्टिकोण भी लाए हैं। आयोग की रिपोर्ट बताती है कि 39 प्रतिशत प्रवासियों ने (Agriculture and Horticulture) को अपने व्यवसाय के रूप में चुना है। वे अब पारंपरिक खेती के बजाय वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। इनके आने से बंजर पड़ी जमीनों पर फिर से हरियाली छाने लगी है और सेब से लेकर कीवी तक के बागानों से पहाड़ की तकदीर बदलने लगी है।
होम स्टे और पर्यटन से चमकी किस्मत
उत्तराखंड की खूबसूरती को दुनिया के सामने पेश करने के लिए प्रवासियों ने पर्यटन क्षेत्र में भी क्रांति ला दी है। लगभग 21 प्रतिशत प्रवासियों ने (Sustainable Tourism activities) और होम स्टे के क्षेत्र में अपना हाथ आजमाया है। अपने वैश्विक अनुभवों के आधार पर वे पर्यटकों को ऐसी सुविधाएं दे रहे हैं जो पहले केवल बड़े होटलों तक सीमित थीं। इससे न केवल उन्हें स्वरोजगार मिला है, बल्कि गांवों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिली है।
पशुपालन और लघु उद्योगों का नया अवतार
खेती और पर्यटन के साथ-साथ पशुपालन भी प्रवासियों की पसंद बना हुआ है। लगभग 18 प्रतिशत प्रवासियों ने आधुनिक (Livestock farming business) शुरू किया है, जबकि 6 प्रतिशत लोग मसाला उद्योग, रेस्टोरेंट और रिटेल दुकानों के जरिए अपनी पहचान बना रहे हैं। ये प्रवासी अब केवल खुद ही आत्मनिर्भर नहीं हैं, बल्कि गांव के अन्य बेरोजगार युवाओं को भी अपने साथ जोड़कर उन्हें स्वरोजगार के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। इनके छोटे-छोटे स्टार्टअप अब बड़े ब्रांड्स को टक्कर देने के लिए तैयार हो रहे हैं।
हर जिले में सजेगी ‘प्रवासी पंचायत’ की चौपाल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रिवर्स पलायन की इस लहर को और तेज करने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है। सरकार अब हर जिले में (Pr प्रवासी Panchayat implementation) की योजना बना रही है। इन पंचायतों का मुख्य उद्देश्य गांव लौटे प्रवासियों की समस्याओं को सुनना और उनकी सफलता की कहानियों को साझा करना है। सीएम के निर्देश पर पलायन आयोग अब ऐसी रणनीति बना रहा है जिससे लौट रहे प्रवासियों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कोई अड़चन न आए और उनकी राह आसान हो सके।
मोटे अनाजों की ऑनलाइन मार्केटिंग का कमाल
आधुनिक तकनीक और पारंपरिक उत्पादों का संगम अब उत्तरकाशी जैसे जिलों में देखने को मिल रहा है। आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी के अनुसार, कई प्रवासी अब मंडुआ और झंगोरा जैसे (Organic Millet marketing) को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए देश-विदेश तक पहुंचा रहे हैं। जो उत्पाद कभी सिर्फ पहाड़ की रसोई तक सीमित थे, वे अब प्रवासियों के मार्केटिंग कौशल की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में महंगे दामों पर बिक रहे हैं। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि अनुभव और अवसर मिलकर चमत्कार कर सकते हैं।
भविष्य की नई और आत्मनिर्भर तस्वीर
आने वाले समय में उत्तराखंड का ‘रिवर्स पलायन’ मॉडल देश के अन्य पहाड़ी राज्यों के लिए एक मिसाल बनने वाला है। जिस तरह से (Economic development projects) को धरातल पर उतारा जा रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी अब पहाड़ के ही काम आएगी। सरकार के निरंतर प्रयासों और प्रवासियों की दृढ़ इच्छाशक्ति ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा मिले, तो पलायन के दंश को विकास के उत्सव में बदला जा सकता है।



