Digital Language Impact: परीक्षा की कॉपियों में छात्रों ने लिखी व्हाट्सएप वाली भाषा, प्रोफेसर हुए हैरान
Digital Language Impact: उत्तराखंड के शैक्षिक गलियारों से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने शिक्षाविदों और अभिभावकों की नींद उड़ा दी है। कुमाऊं विश्वविद्यालय की हालिया स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षाओं के मूल्यांकन के दौरान यह पाया गया कि छात्रों की लेखन शैली में मोबाइल और सोशल मीडिया का गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। छात्र अब अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में मानक भाषा के बजाय (Social Media Slang) का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। मोबाइल की बढ़ती लत और किताबों से कम होती रुचि ने विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति क्षमता को इस कदर प्रभावित किया है कि वे औपचारिक परीक्षाओं और अनौपचारिक चैटिंग के बीच का अंतर भूल गए हैं।

व्हाट्सएप और डिजिटल चैट की भाषा का कॉपियों में प्रवेश
हल्द्वानी के प्रसिद्ध एमबीपीजी कॉलेज में कॉपियों की जांच कर रहे प्राध्यापकों ने बताया कि छात्र अब लंबे उत्तर लिखने के बजाय शॉर्टकट का सहारा ले रहे हैं। कॉपियों में ‘Because’ जैसे महत्वपूर्ण शब्द को ‘Bcoz’ और ‘Between’ को ‘B/w’ लिखा जा रहा है। मूल्यांकन कार्य में जुटे शिक्षकों के अनुसार, (Academic Writing Standards) का सरेआम उल्लंघन हो रहा है क्योंकि छात्र ‘Before’ की जगह ‘B4’ और ‘And’ के स्थान पर केवल ‘&’ चिन्ह का उपयोग कर रहे हैं। सबसे ज्यादा हैरानी तब हुई जब कुछ छात्रों ने उत्तरों के अंत में ‘LOL’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जो केवल हंसी-मजाक की चैटिंग के लिए बने हैं।
हाइब्रिड भाषा और रोमन लिपि का बढ़ता इस्तेमाल
आज की युवा पीढ़ी हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर एक अजीबोगरीब हाइब्रिड भाषा तैयार कर रही है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने पाया कि छात्र हिंदी के वाक्यों को भी रोमन लिपि में लिख रहे हैं, जैसे वे मोबाइल पर मैसेज टाइप करते हैं। इस (Language Hybridization Process) के कारण न तो उनकी हिंदी शुद्ध रह गई है और न ही अंग्रेजी। छोटे प्रश्नों के उत्तर तो छात्र किसी तरह दे पा रहे हैं, लेकिन जब बात विस्तृत उत्तरों की आती है, तो वे एक ही बात को बार-बार दोहरा रहे हैं या उत्तर पुस्तिका को खाली छोड़ दे रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था और मूल्यांकन पर गंभीर संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना काल के बाद से डिजिटल स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ने के कारण छात्रों की लिखने की आदत छूट गई है। किताबों से दूरी ने उनकी शब्दावली को सीमित कर दिया है। परीक्षा कक्ष में (Formal Education Assessment) के दौरान जब उन्हें सोचने और लिखने की आवश्यकता होती है, तो उनका मस्तिष्क केवल उन शब्दों को याद कर पाता है जिनका उपयोग वे दिन भर व्हाट्सएप या इंस्टाग्राम पर करते हैं। यह स्थिति केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर के कई विश्वविद्यालयों में इसी तरह के रुझान देखने को मिल रहे हैं, जो भविष्य की बौद्धिक क्षमता के लिए खतरे की घंटी है।
फरवरी में जारी होंगे परीक्षा परिणाम
कुमाऊं विश्वविद्यालय प्रशासन इस स्थिति को लेकर चिंतित है, लेकिन मूल्यांकन प्रक्रिया को समय पर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, उत्तर पुस्तिकाओं की जांच का कार्य जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी के पहले सप्ताह तक पूरा कर लिया जाएगा। (Examination Result Declaration) की तैयारी फरवरी के मध्य तक की जा रही है। शिक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे भाषा की इन गलतियों पर गंभीरता से गौर करें और छात्रों को भविष्य के लिए जागरूक करें। विश्वविद्यालय अब लेखन कौशल सुधारने के लिए विशेष कार्यशालाएं आयोजित करने पर भी विचार कर रहा है।
छात्रों को सुधार के लिए सलाह और सुझाव
इस समस्या का समाधान केवल नंबर काटने से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए बुनियादी स्तर पर बदलाव की जरूरत है। छात्रों को (Effective Communication Skills) विकसित करने के लिए नियमित रूप से समाचार पत्र और साहित्य पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शिक्षकों और अभिभावकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थी मोबाइल का उपयोग केवल सूचना प्राप्त करने के लिए करें, न कि उसे अपनी भाषा का आधार बनाएं। यदि समय रहते इस स्लैंग कल्चर पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में प्रोफेशनल करियर और इंटरव्यू के दौरान इन युवाओं को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।



