उत्तराखण्ड

POCSO Court Verdict: पोक्सो एक्ट का गलत इस्तेमाल, डीएनए रिपोर्ट ने बेगुनाह को जेल से कराया बरी

POCSO Court Verdict: उत्तराखंड के नैनीताल जिले से न्याय और कानून के बीच उलझी एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने सबको चौंका दिया है। भीमताल थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और उसे गर्भवती करने के गंभीर आरोप में एक युवक को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया था। लगभग तीन साल के लंबे कानूनी संघर्ष और सामाजिक प्रताड़ना के बाद आखिरकार सच्चाई सामने आई और युवक को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया। इस (Judicial System Integrity) को कायम रखते हुए अदालत ने पाया कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप न केवल निराधार थे, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी गलत साबित हुए।

POCSO Court Verdict
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नाबालिग के गर्भवती होने पर रिश्तेदार पर लगा था आरोप

घटना की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई थी जब भीमताल क्षेत्र की एक 15 वर्षीय किशोरी की अचानक तबीयत खराब हो गई। जब परिजन उसे लेकर अस्पताल पहुंचे, तो डॉक्टरों की जांच में पता चला कि किशोरी गर्भवती है। इस खबर ने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी। कुछ समय बाद हल्द्वानी के एक अस्पताल में किशोरी ने एक बच्चे को जन्म दिया। लोक-लाज और दबाव के बीच किशोरी ने अपने ही एक दूर के रिश्तेदार का नाम लिया जो बागेश्वर का निवासी था। किशोरी के बयान को आधार मानकर पुलिस ने (Criminal Investigation Process) शुरू की और आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया।

डीएनए रिपोर्ट ने पलटा पूरा मामला और खुली पोल

पुलिस ने किशोरी के बयान के आधार पर 18 मई 2023 को पोक्सो एक्ट की संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था। आरोपी युवक को 20 मई को जेल भेज दिया गया, जहां उसने करीब एक साल का समय काटा। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने नवजात बच्चे और आरोपी युवक का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया। जब (DNA Profiling Report) अदालत के सामने पेश की गई, तो सच जानकर सब हैरान रह गए। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि आरोपी युवक और बच्चे का डीएनए बिल्कुल भी मेल नहीं खाता है, जिससे यह प्रमाणित हो गया कि वह उस बच्चे का जैविक पिता नहीं है।

एक साल की जेल और सामाजिक बदनामी का दंश

भले ही युवक को 15 मई 2024 को जमानत मिल गई थी, लेकिन उसके सिर पर लगा बलात्कार का कलंक उसे समाज में चैन से जीने नहीं दे रहा था। पोक्सो जैसे गंभीर मामलों में समाज अक्सर आरोपी को दोषी की नजर से ही देखता है। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि युवक को (False Allegation Consequences) भुगतने पड़े हैं और उसे झूठी गवाही के आधार पर फंसाया गया था। डीएनए के वैज्ञानिक साक्ष्य इतने पुख्ता थे कि अभियोजन पक्ष के पास युवक के खिलाफ कहने के लिए कोई ठोस दलील नहीं बची थी।

अदालत ने युवक को किया दोषमुक्त और दी बड़ी राहत

नैनीताल की विशेष अदालत ने मामले के सभी साक्ष्यों और डीएनए रिपोर्ट का बारीकी से अवलोकन करने के बाद अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि आरोपी बच्चे का पिता नहीं है और उसके खिलाफ कोई अन्य प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है, इसलिए उसे सभी आरोपों से मुक्त किया जाता है। इस (Legal Justice Relief) के बाद युवक और उसके परिवार ने राहत की सांस ली है। अदालत ने माना कि भावनाओं और बयानों से कहीं अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं, विशेषकर तब जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान दांव पर लगा हो।

झूठे मुकदमों से निपटने के लिए कड़े कानून की जरूरत

इस मामले ने एक बार फिर उन चर्चाओं को जन्म दे दिया है कि पोक्सो एक्ट जैसे कड़े कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। बेगुनाह युवक ने अपने जीवन के अनमोल साल जेल में बिताए और उसका करियर भी प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि (False Rape Accusation) करने वालों के खिलाफ भी सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि निर्दोष लोगों को न्याय व्यवस्था के चक्रव्यूह में न फंसना पड़े। फिलहाल युवक अपने घर वापस लौट गया है, लेकिन उसके मन पर लगे घाव भरने में अभी वक्त लगेगा।

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