Sambhal Violence Case Investigation: खाकी पर लगे आरोपों को पुलिस ने किया धुआं और बताई बिस्किट वाले ठेले की असली कहानी
Sambhal Violence Case Investigation: संभल में जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान जो परिस्थितियां थीं, वे किसी से छिपी नहीं हैं। प्रशासन ने उस समय पूरे इलाके को एक छावनी में तब्दील कर दिया था ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। उस दिन (Three Layer Security) का घेरा इतना सख्त था कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। ऐसे में पुलिस का तर्क है कि जब चप्पे-चप्पे पर फोर्स तैनात थी और बाजार पूरी तरह बंद थे, तो किसी बाहरी व्यक्ति का वहां पहुंचना नामुमकिन था।

बिस्किट बेचने वाले युवक की कहानी पर उठे सवाल
हिंसा के दौरान घायल हुए आलम नामक युवक के पिता ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनका बेटा ठेला लेकर बिस्किट बेचने निकला था और पुलिस की गोली का शिकार हो गया। हालांकि, संभल के एसपी ने इस (Suspicious Injury Claim) को पूरी तरह से नकार दिया है। पुलिस का कहना है कि जब इलाके में धारा 163 लागू थी और आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित थी, तो कोई भी व्यक्ति ठेला लेकर मस्जिद के इतने करीब कैसे पहुंच सकता था।
7.65 एमएम की गोली ने खोली साजिश की पोल
जांच में सबसे बड़ा खुलासा उस गोली को लेकर हुआ है जो युवक के शरीर से बरामद की गई है। एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई ने स्पष्ट किया कि युवक को (Illegal Weapon Ammunition) यानी 7.65 एमएम की गोली लगी है। गौर करने वाली बात यह है कि यह बोर पुलिस द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पुलिस का दावा है कि यह गोली दंगाइयों के पास मौजूद अवैध हथियारों से चली थी, न कि खाकी वर्दीधारियों की बंदूक से।
शारिक साटा गिरोह और बरामद हथियारों का कनेक्शन
पुलिस की तफ्तीश में यह बात सामने आई है कि हिंसा के दौरान बदमाशों के कुछ खास गुट सक्रिय थे। जिस बोर की गोली युवक को लगी, वैसी ही गोलियां (Criminal Gang Involvement) वाले शारिक साटा गिरोह के गुर्गों से बरामद की गई हैं। पुलिस ने वे हथियार भी जब्त कर लिए हैं जिनसे फायरिंग की गई थी। अधिकारियों का कहना है कि बदमाशों ने खुद अपनी फायरिंग से लोगों को जख्मी किया और इल्जाम पुलिस के मत्थे मढ़ने की कोशिश की।
कोर्ट के आदेश और पुलिस की अगली रणनीति
चंदाैसी कोर्ट ने तत्कालीन सीओ और कोतवाल सहित कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस (Legal Court Order) के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। हालांकि, एसपी का कहना है कि न्यायिक जांच आयोग ने पहले ही अपनी रिपोर्ट में पुलिस को क्लीन चिट दे दी है। पुलिस इस आदेश के खिलाफ अब सक्षम न्यायालय में अपील करने की तैयारी कर रही है ताकि तथ्यों को दोबारा स्पष्ट किया जा सके।
समय के फेरबदल ने उलझाया पूरा मामला
घटनाक्रम के समय को लेकर भी पुलिस और पीड़ित पक्ष के बयानों में बड़ा विरोधाभास नजर आ रहा है। डीएम संभल के अनुसार, भीड़ ने सुबह 7:45 बजे से पहले ही बवाल शुरू कर दिया था, जबकि शिकायतकर्ता का कहना है कि उसका बेटा (Timeline Discrepancy Case) के तहत 8 बजे घर से निकला था। यदि युवक 8 बजे घर से निकला, तो वह उस समय और स्थान पर कैसे मौजूद हो सकता था जहां पुलिस और दंगाइयों के बीच पहले से ही मोर्चा छिड़ा हुआ था।
घायल पुलिसकर्मियों की दास्तां और न्यायिक रिपोर्ट
सर्वे के दिन हुई हिंसा केवल आम लोगों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें ड्यूटी पर तैनात 29 पुलिसकर्मी भी गंभीर रूप से घायल हुए थे। (Judicial Commission Inquiry) की रिपोर्ट में भी यह बात निकलकर आई है कि भीड़ की तरफ से पत्थरबाजी और फायरिंग की गई थी। पुलिस का कहना है कि उन्होंने केवल भीड़ को खदेड़ने के लिए मोर्चा संभाला था और आत्मरक्षा में कार्रवाई की थी, जिसमें किसी को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया गया।
ऑपरेशन और अस्पताल में जिंदगी की जंग
पीड़ित पक्ष के अनुसार, आलम को तीन गोलियां लगी थीं, जिसके बाद उसे मेरठ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां उसका (Critical Surgical Operation) हुआ, जिसके बाद उसकी जान बच सकी। पिता यामीन का कहना है कि पुलिस ने उनके बेटे पर जान से मारने की नीयत से हमला किया था। इस भावुक दलील के आधार पर ही कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं, जिससे मामला अब कानूनी पेचीदगियों में फंस गया है।
खाकी की साख और इंसाफ की उम्मीद
संभल की यह घटना अब एक बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। जहां एक ओर पीड़ित परिवार इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहा है, वहीं दूसरी ओर पुलिस (Police Force Integrity) को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा ले रही है। अब सबकी निगाहें सक्षम न्यायालय की अगली सुनवाई और पुलिस की अपील पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सके कि उस दिन जामा मस्जिद के पास असल में क्या हुआ था।



