PowerPrivatization – यूपी में बिजली निजीकरण प्रस्ताव पर उठे सवाल
PowerPrivatization – उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को लेकर एक बार फिर निजीकरण पर बहस तेज हो गई है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने मौजूदा हालात का हवाला देते हुए निजीकरण के प्रस्ताव पर पुनर्विचार की मांग की है। परिषद का कहना है कि प्रदेश में अधिकांश उपभोक्ता घरेलू श्रेणी के हैं और इनमें भी बड़ी संख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों की है। ऐसे में किसी भी प्रकार के निजीकरण का सीधा असर आम परिवारों पर पड़ेगा। परिषद ने यह भी दावा किया है कि हाल के वर्षों में बिजली कंपनियों के प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया गया है, जिससे निजीकरण की जरूरत पर सवाल खड़े होते हैं।

घरेलू उपभोक्ताओं की बड़ी हिस्सेदारी
परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा के अनुसार, उत्तर प्रदेश देश का ऐसा राज्य है जहां घरेलू बिजली उपभोक्ताओं की संख्या सबसे अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में कुल करीब 3 करोड़ 72 लाख उपभोक्ता हैं। इनमें से लगभग 87 प्रतिशत यानी 3 करोड़ 24 लाख से अधिक घरेलू श्रेणी में आते हैं। खास बात यह है कि करीब 1 करोड़ 72 लाख उपभोक्ता गरीबी रेखा के नीचे दर्ज हैं, जो कुल का लगभग 46 प्रतिशत हैं। परिषद का तर्क है कि जब इतनी बड़ी आबादी सीधे तौर पर घरेलू खपत से जुड़ी है, तो निजीकरण की स्थिति में दरों और सेवाओं पर असर पड़ना तय है।
औद्योगिक कनेक्शन सीमित
प्रदेश में औद्योगिक उपभोक्ताओं की संख्या कुल का लगभग एक प्रतिशत बताई गई है, जो करीब 2 लाख 15 हजार है। इसके अलावा वाणिज्यिक उपभोक्ता करीब 6 प्रतिशत, कृषि उपभोक्ता लगभग 4 प्रतिशत और सरकारी कनेक्शन लगभग एक प्रतिशत हैं। परिषद का कहना है कि जिन राज्यों में औद्योगिक उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी अधिक होती है, वहां निजी क्षेत्र की भागीदारी से वित्तीय स्थिति में तेजी से सुधार हो सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की संरचना अलग है, जहां राजस्व का बड़ा हिस्सा घरेलू उपभोक्ताओं से आता है। ऐसे में नीतिगत बदलाव सोच-समझकर किए जाने चाहिए।
हानियों में आई कमी
परिषद ने बिजली कंपनियों के प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े भी साझा किए हैं। वर्ष 2021-22 में प्रदेश की बिजली कंपनियों की एटी एंड सी हानियां 31.19 प्रतिशत थीं, जो वर्ष 2024-25 में घटकर 19.21 प्रतिशत रह गई हैं। इसी तरह वितरण हानियां 19.80 प्रतिशत से घटकर 13.71 प्रतिशत तक पहुंच गईं। परिषद का कहना है कि ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकारी तंत्र के भीतर रहते हुए भी सुधार संभव है। उनका तर्क है कि पारदर्शिता, बेहतर प्रबंधन और उपभोक्ता सेवा में सुधार के जरिए कंपनियों को मजबूत किया जा सकता है।
विधानसभा में उठा मुद्दा
हाल ही में विधानसभा में ऊर्जा मंत्री ने टोरेंट पावर और नोएडा पावर कंपनी का उदाहरण देते हुए निजीकरण के पक्ष में बात रखी थी। उनका कहना था कि निजी भागीदारी से सेवा गुणवत्ता और राजस्व वसूली में सुधार होता है। हालांकि परिषद का मत इससे अलग है। उनका कहना है कि प्रदेश की परिस्थितियां अन्य राज्यों या शहरों से भिन्न हैं। इसलिए किसी भी मॉडल को लागू करने से पहले स्थानीय सामाजिक और आर्थिक संरचना को ध्यान में रखना जरूरी है।
संतुलित नीति की मांग
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सुझाव दिया है कि औद्योगिक शांति बनाए रखते हुए उपभोक्ता हितों की रक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका मानना है कि बिजली क्षेत्र में सुधार के लिए केवल स्वामित्व परिवर्तन ही समाधान नहीं है। मजबूत निगरानी तंत्र, जवाबदेही और तकनीकी सुधारों के जरिए भी बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। फिलहाल इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय सरकार को लेना है, लेकिन बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिजली व्यवस्था का प्रश्न सीधे तौर पर करोड़ों उपभोक्ताओं के जीवन से जुड़ा है।



