Politics – अजय राय ने केजीएमयू मजार पर चादर चढ़ाकर सरकार पर सवाल उठाए
Politics – लखनऊ के केजीएमयू परिसर में स्थित पुरानी मजार पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने चादर चढ़ाई और इसके बाद पूरे घटनाक्रम को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से मजार पर हाजिरी लगाई, कुछ देर वहीं रुककर स्थानीय लोगों से बातचीत की और फिर मीडिया के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट की। राय ने कहा कि यह मजार मेडिकल विश्वविद्यालय के अस्तित्व में आने से पहले की है और इसे किसी भी तरह का अतिक्रमण बताना इतिहास के साथ अन्याय है।

उनके मुताबिक यह मामला केवल एक धार्मिक स्थल का नहीं, बल्कि लखनऊ की विरासत और सामाजिक स्मृति से जुड़ा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि विकास के नाम पर किसी समुदाय की आस्था या शहर की ऐतिहासिक पहचान को मिटाया नहीं जाना चाहिए। उनके इस कदम को समर्थकों ने परंपरा के प्रति सम्मान बताया, जबकि प्रशासनिक हलकों में इसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया।
मजार और परिसर को लेकर छिड़ी बहस
केजीएमयू परिसर के भीतर मौजूद इस मजार को लेकर पिछले कुछ समय से चर्चा चल रही है। प्रशासन का कहना है कि परिसर के भीतर ऐसी संरचनाओं की समीक्षा की जा रही है, जबकि स्थानीय श्रद्धालु इसे सदियों पुरानी आस्था का प्रतीक मानते हैं। अजय राय ने इसी पृष्ठभूमि में चादर चढ़ाने का फैसला किया ताकि यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेस इस मुद्दे पर मौन नहीं रहेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक विकास कार्यों पर ध्यान देने के बजाय जगह-जगह तोड़फोड़ और हटाने की कार्रवाई में लगी है। राय के अनुसार, अगर ऐतिहासिक स्थलों को इस तरह निशाना बनाया गया तो शहर की सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय का निर्माण जिस जमीन पर हुआ, उसका इतिहास नवाबी दौर से जुड़ा हो सकता है और उस विरासत को नकारा नहीं जा सकता।
इतिहास बनाम प्रशासन की कार्यवाही
राय ने प्रशासन द्वारा मजार को नोटिस जारी किए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि किसी भी कार्रवाई से पहले स्थानीय समुदाय, इतिहासकारों और नागरिक समाज से संवाद होना चाहिए था। उन्होंने यह तर्क दिया कि लखनऊ की पहचान केवल आधुनिक इमारतों से नहीं, बल्कि उसके पुराने स्मारकों, मजारों और परंपराओं से भी बनी है। कांग्रेस नेता के मुताबिक विकास और विरासत को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया के कई शहरों में ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित करते हुए आधुनिक संस्थान बनाए गए हैं। राय ने चेतावनी दी कि अगर बिना संवेदनशीलता के फैसले लिए गए तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है, जो किसी के हित में नहीं होगा।
राजनीतिक टकराव और स्थानीय प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम ने लखनऊ की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। भाजपा नेताओं ने जहां इसे कानून और व्यवस्था का मामला बताया, वहीं कांग्रेस ने इसे सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ दिया है। स्थानीय निवासियों की राय भी बंटी हुई दिखाई देती है—कुछ लोग मजार के संरक्षण के पक्ष में हैं, जबकि कुछ का मानना है कि विश्वविद्यालय परिसर में ऐसी संरचनाओं पर पुनर्विचार जरूरी है। फिलहाल प्रशासन ने इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है, लेकिन संकेत दिए हैं कि कानूनी पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और तीखा हो सकता है, खासकर अगर राजनीतिक दल इसे अपने-अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करते रहे। इस बीच, केजीएमयू परिसर में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए सतर्कता बरती जा रही है।



