ElectionUpdate – मेरठ में सपा की तैयारियां तेज, टिकट को लेकर बढ़ी हलचल
ElectionUpdate – मेरठ, जिसे अक्सर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत का अहम केंद्र माना जाता है, वहां आगामी चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी के भीतर गतिविधियां तेज हो गई हैं। सातों विधानसभा सीटों पर दावेदारों की संख्या इस बार काफी ज्यादा है, जिससे साफ संकेत मिलते हैं कि पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा बढ़ चुकी है। 2022 के चुनाव परिणामों ने सपा को उत्साहित किया है, क्योंकि गठबंधन के साथ उसने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी और दो अन्य सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी।

शहर सीट पर मौजूदा विधायक का मजबूत दावा
मेरठ शहर विधानसभा सीट पर सपा विधायक रफीक अंसारी लगातार दो बार जीत हासिल कर चुके हैं और इस बार भी उनका दावा मजबूत माना जा रहा है। पार्टी के भीतर उनकी स्थिति मजबूत है और हैट्रिक की तैयारी में जुटे हैं। हालांकि, नोमान मुर्तजा भी इस सीट से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। उनके पिता आकिल मुर्तजा पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं, लेकिन मौजूदा समीकरणों को देखते हुए टिकट में बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है।
मेरठ दक्षिण में कई दावेदारों के बीच मुकाबला
मेरठ दक्षिण सीट पर पिछली बार बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिला था, जहां सपा के हाजी आदिल चौधरी मामूली अंतर से हार गए थे। इस बार भी उनका दावा मजबूत है, लेकिन यहां कई अन्य नाम भी चर्चा में हैं। डॉ. किशन पाल गुर्जर, मुखिया गुर्जर, सीमा प्रधान और नवाजिश मंजूर जैसे चेहरे भी टिकट की दौड़ में शामिल हैं, जिससे पार्टी के सामने चयन को लेकर चुनौती बढ़ गई है।
सरधना और किठौर में स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट
सरधना सीट पर विधायक अतुल प्रधान ने पिछले चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता संगीत सोम को हराया था। ऐसे में उनका टिकट लगभग तय माना जा रहा है। वहीं किठौर सीट पर शाहिद मंजूर का प्रभाव कायम है और उनका दावा भी मजबूत नजर आता है, हालांकि बाबर चौहान यहां चुनौती पेश कर सकते हैं।
हस्तिनापुर में टिकट को लेकर संभावित खींचतान
हस्तिनापुर सीट पर स्थिति सबसे ज्यादा जटिल दिखाई दे रही है। पूर्व विधायक योगेश वर्मा एक बार फिर मैदान में उतरना चाहते हैं, जबकि पूर्व मंत्री प्रभुदयाल वाल्मीकि और प्रशांत गौतम भी सक्रिय हैं। पिछली बार यहां हार का अंतर बहुत कम रहा था, इसलिए पार्टी इस सीट को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ रही है।
कैंट और सिवालखास सीट पर बनी अनिश्चितता
मेरठ कैंट सीट पर भाजपा का दबदबा लंबे समय से कायम है और इसे चुनौतीपूर्ण सीट माना जाता है। पिछली बार यह सीट गठबंधन के चलते रालोद के हिस्से में गई थी। इस बार संभावित गठबंधन समीकरणों के चलते यह तय नहीं है कि सपा खुद उम्मीदवार उतारेगी या सीट किसी सहयोगी दल को देगी।
सिवालखास सीट पर भी स्थिति साफ नहीं है। पिछली बार यहां से गठबंधन प्रत्याशी जीते थे, लेकिन अब नए समीकरणों में सपा के सामने उम्मीदवार तय करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कई स्थानीय नेता इस सीट से दावेदारी जता रहे हैं।
पिछले चुनाव के नतीजों से मिली सीख
2022 के चुनाव में मेरठ दक्षिण और हस्तिनापुर जैसी सीटों पर सपा बहुत कम अंतर से हार गई थी। पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि थोड़ी और रणनीतिक मजबूती होती तो परिणाम अलग हो सकते थे। यही वजह है कि इन सीटों पर इस बार उम्मीदवार चयन को लेकर ज्यादा सावधानी बरती जा रही है।
टिकट वितरण में पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौतियां
टिकट वितरण को लेकर पार्टी नेतृत्व के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां उभरकर सामने आ रही हैं। पहली, पुराने और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाना। दूसरी, सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार तय करना। तीसरी, टिकट न मिलने पर असंतोष को नियंत्रित करना, ताकि संगठन में एकजुटता बनी रहे।